नेपाल की ओर से कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा क्षेत्र पर दोबारा दावा किए जाने से संबंधित क्षेत्र के भारतीय लोगों में आक्रोश फैल गया है। स्थानीय लोगों ने नेपाल के दावे को पूरी तरह निराधार बताते हुए कहा कि कालापानी पौराणिक, ऐतिहासिक और प्रशासनिक रूप से भारत का अभिन्न अंग है। उनका कहना है कि राजनीतिक लाभ के लिए बार-बार भारतीय भूभाग पर दावा करना न केवल तथ्यों के विपरीत है बल्कि दोनों देशों के बीच सदियों पुराने रोटी-बेटी के रिश्तों को भी प्रभावित कर सकता है।
भारतीय सीमा से लगा नेपाल का अंतिम गांव छांगरू भी कालापानी से 17 किलोमीटर की दूरी पर बसा है। छांगरू के साथ ही चीन सीमा की ओर स्थित तिंकर गांव में भी रं समुदाय के ही लोग निवास करते हैं। कालापानी भारतीयों का तीर्थ स्थल है। कालापानी, काली नदी का उद्गम स्थल है। यहां पर काली माता का एक मंदिर है। यही काली नदी कालापानी से भारत और नेपाल दोनों देशों का सीमांकन करती है। कालापानी में भारत के गर्ब्यालों की नाप भूमि है जहां सुरक्षा एजेंसियां तैनात हैं। गुंजी से आगे कालापानी और लिपूलेख तक का भी भूभाग निर्जन है।
कालापानी से लिपुलेख की दूरी लगभग 15 किमी है। यहां विशाल दर्रे और पहाड़ियां हैं जबकि यहां से धारचूला की ओर गर्ब्यांग के पा काली नदी पर सीता पुल स्थित है। इसी पुल से भारत और नेपाल के बीच आवाजाही होती है। नेपाल ने फिर से कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को अपना बताया है।
संवाद न्यूज एजेंसी ने इन दावों की हकीकत जानने के लिए स्थानीय लोगों से बातचीत की। स्थानीय लोगों ने कहा कि उनके पास इस जमीन के पुश्तैनी राजस्व रिकॉर्ड, भूमि स्वामित्व के दस्तावेज और वोटर लिस्ट के प्रमाण हैं जो साबित करते हैं कि यह क्षेत्र भारत के पिथौरागढ़ जिले का हिस्सा है। सुगौली की संधि (1816) के तहत महाकाली नदी को सीमा माना गया था। स्थानीय लोगों का साफ तौर पर कहना है कि नेपाल भारत की जमीन पर दावा कर रहा है जो गलत और निराधार है। उनका कहना है कि यह क्षेत्र भारत का था, है और रहेगा।
कालापानी हमारा पुश्तैनी क्षेत्र है। यहां की जमीन हमारे नाम से दर्ज है। नेपाल में भी हमारे नाम पर जमीन दर्ज है। सीमा विवाद के बाद हमने वहां जाना छोड़ दिया। नेपाल का कालापानी क्षेत्र को अपना बताना गलत और निराधार है। - महीराज सिंह गर्ब्याल, गर्ब्यांग