पिथौरागढ़। नवंबर से बर्फ से लकदक रहने वाले पहाड़ इस बार जनवरी में भी काले पड़े हुए हैं। वैज्ञानिक इसके पीछे का कारण पश्चिमी विक्षोभ के सक्रिय नहीं होने के कारण बर्फबारी नहीं होना बता रहे हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि बर्फबारी के कम होने का असर कीड़ाजड़ी (अंग्रेजी में कैटरपिलर फंगस और तिब्बती में यारसागुंबा) के उत्पादन पर भी पड़ सकता है।
कीड़ाजड़ी को शक्तिवर्द्धक माना जाता है। कीड़ाजड़ी हिमालयी क्षेत्र के बुग्यालों में पाई जाती है। बर्फ पिघलने के बाद इसे निकाला जाता है। पिथौरागढ़ जिले में उच्च हिमालयी क्षेत्रों में अक्तूबर में बिल्कुल भी बर्फबारी नहीं हुई है। नवंबर में हल्की बर्फबारी हुई थी जो एक दिन भी नहीं टिकी। नवंबर से जनवरी तक उच्च हिमालय में बर्फबारी बिल्कुल नहीं हुई है। कीड़ाजड़ी के उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण इस्पोरोफाइड को बर्फ में चार माह माइनस चार से पांच डिग्री सेल्सियस तापमान की आवश्यकता होती है।
बर्फ पिघलते ही इस्पोरोफाइड बर्फ से बाहर निकलता है और मिट्टी में गिरता है। हैपिलस कैटरपिलर इस्पोरोफाइड को खाता है। इसके बाद इसका जड़ी के आकार का भाग मिट्टी से बाहर निकलता है। एक ओर से कीड़ा और उसके सिर पर जड़ीनुमा फंगस होने से इसे कीड़ाजड़ी कहा जाता है। चीन की मंडी में इसकी सबसे अधिक मांग रहती है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में यह जड़ी करीब 18 लाख रुपये किलो बिकती है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी भारी मांग को देखते हुए इसकी तस्करी भी होती है।
बर्फबारी के कम होने से इस बार कीड़ाजड़ी का उत्पादन काफी कम रहने का अनुमान लगाया जा रहा है। सूखी ठंड के कारण उच्च हिमालयी क्षेत्रों में माइनस 10 से माइनस 15 के बीच तापमान तो है लेकिन बर्फ नहीं है और इसका प्रभाव कीड़ाजड़ी उत्पादन पर पड़ने का अंदेशा है। देहरादून मौसम विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक बिक्रम सिंह का कहना है कि पश्चिमी विक्षोभ के सक्रिय नहीं होने से इस बार बारिश और बर्फबारी नहीं हो रही है।
बर्फबारी और बारिश नहीं होने से पेयजल संकट गंभीर रहेगा। बारिश और बर्फबारी नहीं होने के कारण प्राकृतिक जल स्रोत रिचार्ज नहीं हो पाए हैं। अभी से पिथौरागढ़ जिले के विभिन्न हिस्सों में पेयजल संकट गहराने लगा है। अगर ऐसा ही रहा तो स्थिति और अधिक गंभीर हो सकती है। संवाद
आजीविका का साधन है कीड़ाजड़ी
पिथौरागढ़। कीड़ाजड़ी सीमांत के लोगों की आजीविका का प्रमुख साधन है। वर्तमान में एक किलो कीड़ाजड़ी ग्रेड के अनुसार 12 से 15 लाख रुपये प्रति किलो की दर से बिकती है। बर्फ के पिघलने के बाद धारचूला और मुनस्यारी के उच्च हिमालयी क्षेत्र के ग्रामीण कीड़ाजड़ी दोहन के लिए उच्च हिमालयी क्षेत्रों में जाते हैं। संवाद
कई बीमारियों में असरदार
कीड़ाजड़ी का इस्तेमाल प्राकृतिक स्टेरॉयड की तरह किया जाता है। शक्तिवर्धक होने के साथ ही कैंसर जैसी बीमारी के इलाज में भी इस जड़ी को काफी असरदार माना जाता है। आयुर्वेद के मुताबिक गुर्दे और सांस की बीमारी को सही करने में भी इसका इस्तेमाल किया जाता है। इसके अलावा इस जड़ी का इस्तेमाल रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में भी किया जाता है।
कोट
बर्फबारी कम होने का असर निश्चित तौर पर कीड़ाजड़ी के उत्पादन पर पड़ेगा। ग्लोबल वार्मिंग के कारण मौसम परिवर्तन हो रहा है जो अच्छे संकेत नहीं हैं। - एसके पांडे, वरिष्ठ वैज्ञानिक, डीआरडीओ, पिथौरागढ़।