तिब्बत की मंडी ले जाने के लिए रखा गया डिब्बाबंद गुड़, मिश्री
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तिब्बत की मंडी तकलाकोट में इस बार गुड़, मिश्री की बिक्री हो सकेगी। चीन सरकार ने वर्ष 2014 में गुड़, मिश्री लाने पर इसलिए प्रतिबंध लगा दिया था कि यह खुले में बेचा जाता है। इसमें निर्माण की तिथि अंकित नहीं होती। खुले में गुड़, मिश्री बेचने से गंदगी फैलती है। यह स्वास्थ्य के लिए घातक है। प्रतिबंध के कारण वर्ष 2015, 2016 में सीमांत के व्यापारी तिब्बत की मंडी तकलाकोट के लिए गुड़, मिश्री का निर्यात नहीं कर पाए थे। इससे व्यापार में घाटा उठाना पड़ा था।
भारतीय व्यापारी उससे पहले हर साल कम से कम 50 क्विंटल गुड़ और इतनी ही मिश्री तिब्बत की मंडी पहुंचाते थे। तिब्बत में गुड़, मिश्री की मांग ज्यादा है। इसकी कीमत भी अच्छी मिल जाती है। इस बार युवा व्यापारी दिनेश गुंज्याल ने इस प्रतिबंध से निपटने का तरीका ढूंढ निकाला है। उन्होंने दिल्ली, हरदोई, मेरठ स्थित चीनी मिलों से संपर्क साधा और गुणवत्ता वाला गुड़, मिश्री के पैकेट तैयार करा लिए। इनकी पैकिंग मई 2017 में कर दी गई थी। इसकी मियाद तिथि छह माह तक रखी गई। प्रत्येक पैकेट का वजन 1.200 किलो रखा गया है।
पहले चरण में उन्होंने दो क्विंटल गुड़ और इतनी ही मिश्री के पैकेट तैयार करवाए हैं। दिनेश गुंज्याल इस माह के मध्य में तकलाकोट जाने की तैयारी में हैं। वह अपने साथ गुड़, मिश्री भी लेकर जाएंगे। यदि तकलाकोट में गुड़, मिश्री की मांग ठीक रही तो अन्य व्यापारियों को भी इसके लिए प्रेरित करेंगे। गुंज्याल का दावा है कि पैकेट में रखा गया गुड़, मिश्री क्वालिटी में बहुत अच्छा है। यह खुले में बिकने वाले गुड़, मिश्री की तुलना में ज्यादा स्वादिष्ट है। उन्होंने उम्मीद जताई कि तिब्बत के लोगों को यह उत्पाद पसंद आएगा और पैकेट में होने के कारण इससे गंदगी भी नहीं फैलेगी। उन्होंने कहा कि पैकेट में निर्माता कंपनी का नाम भी अंकित है। अभी तिब्बत की मंडी गए व्यापारी अपने साथ गुड़, मिश्री लेकर नहीं गए हैं।
परंपरागत व्यापार में कमी न आए
युवा व्यापारी दिनेश गुंज्याल के पिता हरी लाल गुंज्याल तिब्बत व्यापार में हिस्सा लेने वाले सबसे पुराने व्यापारी रहे हैं। 1962 से पहले जब तिब्बत व्यापार में किसी प्रकार का प्रतिबंध नहीं था, तब भी हरी लाल तकलाकोट मंडी जाकर व्यापार करते थे। 1992 में जब दोबारा व्यापार शुरू हुआ तो हरी लाल गुंज्याल हर साल व्यापार में हिस्सा लेते रहे। दिनेश का कहना है कि इस परंपरागत व्यापार में किसी प्रकार की कमी नहीं आनी चाहिए।