थल के गर्जिला गांव में खाली पड़ा मकान
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वर्ष 1980 से लगातार आपदा का दंश झेल रहे गर्जिला गांव में अब सिर्फ तीन परिवार रह गए हैं। 1980 से पहले यहां पर 22 परिवार रहते थे। 1980 में गांव के पास हुए भारी भूस्खलन के बाद जब सरकार ने सुरक्षा के कोई प्रबंध नहीं किए तो 10 परिवारों ने एक साथ गांव छोड़ दिया, लेकिन गांव का पीछा कर रही आपदा ने फिर 2007 में गांव में भारी नुकसान पहुंचाया। कई मकानों में दरार आ गई और कई खतरे की जद में आ गए। उसके बाद गांव के नौ परिवार भी गांव छोड़कर चले गए।
अब गांव में वीरेंद्र राम, भागीरथी देवी और पानुली देवी के ही परिवार रहते हैं। यह तीनों परिवार भी खतरे के साये में हैं। बताते हैं कि 1980 से पहले यह इस इलाके में सबसे संपन्न गांव था। लोग सामाजिक रूप से संगठित रहते थे, लेकिन आपदा ने पूरे गांव को बिखराकर रख दिया है। अब अधिकांश परिवार अलग-अलग स्थानों पर बस गए हैं। आपदा का असर सांस्कृतिक और सामाजिक आयोजनों पर भी पड़ा है।
गांव के लोगों का कहना है कि अब तक किसी सरकार ने उनके दुख-दर्द को सुनने की कोशिश नहीं की। नई सरकार से उन्होंने उम्मीद लगाई है कि कम से कम गांव में रह गए तीन परिवारों के लिए कोई व्यवस्था की जाए। हर साल बारिश के मौसम में गांव के आसपास की जमीन खिसकती रहती है। सारे खेत दब चुके हैं। खतरे से घिरे कई मकानों को लोगों ने छोड़ दिया है। वह खंडहर में तब्दील होते जा रहे हैं।
इन दुखों का कोई तो निदान करे
गर्जिला गांव में रहने वाली कलावती देवी का कहना है कि दुखों का निदान किसी ने नहीं किया। नेता और अधिकारी गांव में आए थे, लेकिन भूकटाव से खतरे में घिरे इस गांव में सुरक्षा के नाम पर अब तक एक पत्थर नहीं लगा है। वह कहती हैं कि इस तरह की अनदेखी से तो पूरा गांव खाली होने लगा है। अब तीन परिवार कैसे गांव में समय बिताएंगे।