वन विभाग ने औषधीय महत्व के, लेकिन विलुप्त होने की कगार पर पहुंच चुके कासनी पौध के संरक्षण की पहल शुरू कर दी है। पहाड़ पर पहले प्राकृतिक रूप से कासनी के पौधे बहुतायत में मिलते थे, लेकिन धीरे-धीरे जलवायु परिवर्तन के कारण यह पौधे विलुप्त होने की कगार पर हैं। ज्यादा नमी वाले स्थानों पर पहले कासनी के पौध खुद ही उग आते थे।
वन विभाग के अधिकारियों ने विलुप्त हो रहे इस पौधे के संरक्षण के लिए दो माह पहले अपनी नर्सरी में रोपण किया। करीब एक हजार पौधे नर्सरी में उगाए गए हैं। पौधों को नर्सरी में पर्याप्त नमी उपलब्ध कराने के लिए समय-समय पर सिंचाई की जाती है। कासनी के इस पौधे में ठीक चार महीने बाद फूल आ जाते हैं। इस समय तापमान की कमी के कारण पौधों की वृद्धि कम हो रही है। नर्सरी में पौधों की स्थिति से अधिकारी बेहद खुश हैं।
वन क्षेत्राधिकारी राजेंद्र सिंह बिष्ट ने बताया कि यदि किसान इन पौधों का रोपण करना चाहें तो नर्सरी से पौधे उपलब्ध कराए जाएंगे। उन्होंने कहा कि दिखने में बेहद सुंदर कासनी का फूल ही बहुउपयोगी होता है। उन्होंने उम्मीद जताई कि जल्दी ही इस पौधे का प्रसार फिर से बढ़ने लगेगा और कोशिश की जाएगी कि नमी वाले स्थानों पर इनका रोपण किया जाए।
कई रोगों में काम आता है कासनी का फूल
कासनी का बॉटनिकल नाम चिंचोरियम एंटीबस है। करीब छह इंच लंबे इसके पौधे पर कई फूल आते हैं। इन फूलों की या फिर पौधे की दो पत्तियों को सुबह के समय खाली पेट खाने से मधुमेह, लीवर, किडनी, रक्तचाप, एलर्जी जैसी दिक्कत दूर हो जाती। आयुर्वेदिक चिकित्सक डॉ. डीएस बोनाल ने बताया कि कासनी के पौधे का आयुर्वेद की दृष्टि से बेहद महत्व है। उन्होंने कहा कि कासनी के फूल और पत्तियों का सेवन हर व्यक्ति को करना चाहिए। इससे रक्तचाप सामान्य रहता है।
नई पीढ़ी को पौध के बारे में पता नहीं
नई पीढ़ी को कासनी के पौधे के बारे में कुछ पता नहीं है। पहले बुजुर्ग लोग कासनी के पौधों से कई प्रकार की दवाइयां तैयार करते थे। उस समय पहाड़ों पर अस्पतालों की संख्या कम थी और लोग वैद्य से ही इलाज कराते थे। अब वैद्य समाप्त हो गए हैं और इलाज के लिए अस्पतालों पर ही निर्भरता रह गई है।