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भारत-तिब्बत व्यापार का मुद्दा किसी के चुनावी एजेंडे में नहीं

Wed, 08 Feb 2017 10:30 PM IST
कृष्णा गर्ब्याल/अमर उजाला, धारचूला
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भारतीय व्यापारिक मंडी गुंजी - फोटो : अमर उजाला
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चुनाव के समय असल मुद्दे गायब हो जाते हैं। राज्य गठन के बाद विधानसभा और लोकसभा के जितने भी चुनाव हुए हैं किसी में भी भारत-तिब्बत अंतरराष्ट्रीय स्थल व्यापार को मुद्दा नहीं बनाया गया, जबकि सीमांत के सैकड़ों व्यापारी इस व्यापार में हिस्सा लेते हैं और उनकी आजीविका का मुख्य साधन भी यही व्यापार है। 1962 में भारत और चीन के बीच संबंध खराब होने के कारण बंद हुआ यह व्यापार 1992 में फिर शुरू तो हो गया, लेकिन व्यापार में हर साल आने वाली दिक्कतों के कारण आम व्यापारी परेशान है।
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आज भी प्रशासन यह व्यवस्था नहीं कर पाया है कि व्यापारियों को समय पर ट्रेड परमिट उपलब्ध कराया जाए, गुंजी मंडी में सुविधाओं का विस्तार किया जाए, गुंजी में स्थापित होने वाली स्टेट बैंक की अस्थायी शाखा में मुद्रा विनिमय की सुविधा दी जाए। तुलनात्मक रूप से देखा जाए तो तिब्बत की मंडी तकलाकोट में जहां सुविधाओं की भरमार है, वहीं भारतीय व्यापारिक मंडी गुंजी में सड़क, संचार जैसी कोई सुविधा नहीं है। सीमांत के व्यापारियों का कहना है कि विधानसभा चुनाव में इस मुद्दे पर कोई भी दावेदार जुबान नहीं खोलता, जबकि सीमांत बड़ा जनजाति समुदाय इस व्यापार से जुड़ा है।

गुंजी मंडी में कोई सुविधा नहीं
10 वर्षों से भारत-तिब्बत व्यापार में हिस्सा ले रहे कल्याण सिंह रायपा बताते हैं कि भारतीय मंडी गुंजी में संसाधनों का अभाव है। यही कारण है कि वर्ष 2002 के बाद तिब्बत के व्यापारियों ने गुंजी आना बंद कर दिया। भारतीय मंडी गुंजी में ट्रेड कार्यालय तक विकसित नहीं हुआ है। गुंजी स्टेट बैंक में मुद्रा विनिमय की सुविधा नहीं है। तिब्बत बार्डर पर लिपुलेख तक जाने के लिए कठिन रास्तों से गुजरना पड़ता है। 
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चुनाव में प्रमुखता से उठे व्यापार का मुद्दा
भारत-तिब्बत व्यापार समिति के सदस्य प्रभात सिंह पायर का कहना है कि तिब्बती क्षेत्र में लिपुलेख दर्रे तक शानदार सड़क है, लेकिन भारतीय व्यापारियों को अब भी लिपुलेख तक 60 किमी पैदल चलकर घोड़े खच्चरों में सामान लादकर व्यापार करना पड़ रहा है। इस कारण सामान से ज्यादा लागत सामान के भाड़े के रूप में चुकाना पड़ता है। चुनाव में व्यापार का मुद्दा प्रमुखता से उठना चाहिए। 
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