पिथौरागढ़। वन्यजीवों के हमले में घायल होने वाले विदेशी नागरिकों या मृतकों की जान की कीमत विभाग की नजर में कुछ भी नहीं है। विभाग ऐसे किसी भी मामले में मुआवजा नहीं देता है। इस बारे में चीफ वाइल्ड लाइफ वार्डन जेएस सुहाग ने शासनादेश का जिक्र करते हुए आगे कुछ भी कहने से मना कर दिया।
वन विभाग के इस अजीबोगरीब नियम के चलते शुक्रवार रात नेपाल मूल के 10 वर्षीय देवराज पुत्र रामचंद्र बोहरा को अपनी जान गंवानी पड़ी। पिछले महीने तेंदुए के हमले से उसकी खाने की नली में गहरा घाव हो गया था, जिसके इलाज के लिए परिजनों को चार लाख से अधिक की जरूरत थी पर गरीब परिवार के पास इतने पैसे नहीं थे कि वह उसका इलाज करा पाते। इलाज के अभाव में बच्चे की जान चली गई।
वहीं अगर भारत में रहने वाले नेपाल मूल के लोगों के मवेशियों को अगर कोई जंगली जानवर निवाला बनाता है तो उस स्थिति में भी उसे मुआवजा नहीं मिलता है। जिले में वर्ष 2014-15में डीडीहाट में तेंदुए ने हमला कर दो नेपाली लोगों को मौत के घाट उतारा दिया था। दो साल पूर्व इग्यारह देवी क्षेत्र में तेंदुए ने एक नेपाली को हमला कर उसे गंभीर घायल कर दिया। एक साल पहले भालू ने एक नेपाली को गंभीर घायल किया था, लेकिन तीनों ही स्थिति में मृतकों के परिजनों और घायलों को मुआवजा नहीं मिल पाया।
वन्य जीवों के हमले में घायल होने वाले या मारे जाने वाले के परिजनों को मुआवजा देने का प्रावधान नहीं है। मुआवजे के लिए आधार कार्ड, बैंक खाता, डॉक्टर की रिपोर्ट और उत्तराधिकारी होने का प्रमाण जरूरी है। नियमों को लेकर संशोधन शासन स्तर से ही संभव है। - एनसी पंत, एसडीओ वन विभाग पिथौरागढ़।