नदी के ऊपर लकड़ी का कच्चा पुल तैयार करते आपदा प्रभावित क्षेत्र के ग्रामीण
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दो जुलाई की आपदा के बीत जाने के बाद भी मुनस्यारी और धारचूला के 40 हजार लोगों के लिए हर कदम जोखिम भरा होकर रह गया है। हालात सामान्य न होने के कारण लोगाें को कई तरह के खतरों का सामना करना पड़ रहा है। लोग दिन में अस्थायी पुल बनाते हैं और रात को यह पुल बह जा रहा है। टेंट में रह रहे परिवार जंगली जानवरों के कारण सहमें हुए हैं।
दो जुलाई को आई आपदा ने मुनस्यारी और धारचूला ब्लॉक में व्यापक तबाही मचाई थी। इस आपदा में नदी नालों में बहने से 10 लोगों की मौत हो गई थी। इनमें से पांच लोगों का अब तक कोई पता नहीं चला है। भूस्खलन से 48 गांवों के 467 से अधिक मकान खतरे की जद में हैं।
आपदा प्रभावित क्षेत्रों में एक माह बाद भी हालात सामान्य नहीं हुए हैं। 110 परिवार टेंट या सरकारी भवनों के एक-एक कमरों में शरणार्थी बनकर रहे हैं। इन लोगों को जंगली जानवरों के डर का भी सामना करना पड़ रहा है। इनका कहीं आना जाना भी कम जोखिम भरा नहीं है। आपदा में पुलों के बह जाने से उफनाती नदियों को पार करने के लिए कोई साधन नहीं है। लोगों को लकड़ी के लट्ठों या फिर रस्सियों को पकड़कर नदी-नाले पार करने पड़ रहे हैं।
नदी-नालों के ऊपर ग्रामीण स्वयं पुल तैयार कर रहे हैं। सुबह तैयार होने वाले कई पुलों को नदी रात में बहा ले जाती है। ग्रामीणों की रातें चीड़ के छिलकों से रोशन होती हैं। भदेली में टेंट में दिन गुजार रहे दीपक सिंह, जीवंती देवी, पार्वती देवी, मेहर सिंह के मुताबिक खतरे में आए गांव का जल्दी पुनर्वास किया जाना चाहिए।
310 प्रभावितों को बांटे जा चुके हैं 76 लाख
पिथौरागढ़। जिला प्रशासन की ओर से वर्तमान में आपदा पीड़ितों के लिए 18 राहत शिविर बनाए गए हैं। अब तक 310 आपदा प्रभावितों को 75.94 लाख रुपये की राहत राशि बांटी जा चुकी है। टेंट में रह रहे आपदा प्रभावितों के लिए राशन की व्यवस्था की जा रही है। जिन क्षेत्रों में पुल बह गए हैं वहां पर आवागमन के लिए पक्के पुलों का निर्माण कार्य चल रहा है।