उत्तराखंड राज्य गठन के समय यह विचार प्रमुख रूप से सामने आया था कि पहाड़ों से पलायन रुकेगा। गांवों में सुविधाओं का विस्तार होगा और एक बार फिर से गांवों में समृद्धि लौटेगी, लेकिन कुछ गांवों की तस्वीर देखकर लगता है कि ऐसा कुछ नहीं हुआ। अकेले बरसायत से 17 वर्ष में 22 परिवार गांव छोड़कर चले गए। 35 परिवारों के रहने के लिए बनी 150 मीटर लंबी बाखली अब वीरान पड़ी है। जिन लोगों के पास पैसा था, उन्होंने हल्द्वानी, देहरादून, पिथौरागढ़ में मकान बना लिए। गांव में अब गरीबों के 12 परिवार रह गए हैं।
बरसायत गांव की मुख्य समस्या सड़क रही है। जब गांव से ज्यादातर परिवार जा चुके थे तब सरकार ने सड़क मंजूर दी। यह सड़क अभी कच्ची है और बारिश में बंद हो जाती है। जूनियर की शिक्षा के बाद पढ़ाई के लिए नजदीक में कोई स्कूल नहीं है। चिकित्सा की गांव में कोई सुविधा नहीं है। राज्य गठन के दो वर्ष बाद तक लोग इंतजार करते रहे कि शायद गांव में बुनियादी सुविधाएं जुट जाएंगी, लेकिन जब सरकार ने कोई ध्यान नहीं दिया तो वर्ष 2002 से लोगों का गांव छोड़कर जाने का क्रम शुरू हो गया, जो अब भी जारी है।
जिन परिवारों ने गांव छोड़ा है, उनमें से गांव के जीवन सिंह, मान सिंह, प्रताप राम, हयात राम, देव सिंह, राम सिंह, खड़क सिंह के परिवार हल्द्वानी चले गए। कुंदन बसेड़ा ने पिथौरागढ़ में जमीन खरीदकर मकान बना लिया। दीवान सिंह देहरादून चले गए। गांव के दान सिंह और नेत्र सिंह के परिवार नजदीकी तुरगोली गांव में जाकर बस गए। डिगर सिंह का परिवार साता गांव चला गया। अब तक बाखली में रहने वाले दीपक बसेड़ा ने भी गांव से कुछ दूरी पर मकान बना लिया है।
आसपास के गांवों में फिर भी चहल-पहल
बरसायत गांव में तो पलायन का रोग लग गया है, जबकि बरसायत से करीब एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित सानीखेत में 20 परिवार रहते हैं। मालाझूला में पहले से 35 परिवार थे। अब भी उतने ही हैं। चमाली में भी 18 परिवारों ने गांव नहीं छोड़ा है। बगजिबला में 12 परिवार और लालघाटी में 20 परिवार रहते हैं। इन गांवों के लोगों ने कहा कि बरसायत गांव से लोग एक साथ नहीं वरन एक-एक कर निकले थे। शहरों में जमीन खरीदने और मकान बनाने के बाद ही इन लोगों ने गांव छोड़ा। लोग कहते हैं कि ज्यादा असुविधा में कोई व्यक्ति कितने दिन तक गांवों में रह पाएगा।
राज्य गठन के बाद अपेक्षा बढ़ गई
बरसायत गांव के मोहन सिंह बसेड़ा का कहना है कि पलायन के लिए सरकार जिम्मेदार है। सरकार यदि गांवों में सुविधा बढ़ा देती तो शायद कोई भी अपनी माटी को छोड़कर जाने का विचार तक नहीं लाता। राज्य बनने के बाद लोगों की अपेक्षा ज्यादा बढ़ी थी। इस अपेक्षा को किसी सरकार ने पूरा नहीं किया।
पहाड़ सिर्फ गरीबों के रहने लायक
बरसायत निवासी सुंदर सिंह बसेड़ा का कहना है कि पहाड़ गरीबों के रहने के लिए हो गया है। राज्य बनने के बाद संपन्न लोगों का गांव छोड़ने का क्रम थमा नहीं। इतना तय है कि जो लोग गांव छोड़कर जा चुके हैं वह वापस नहीं आएंगे। शहरी सुविधाओं में जीने के आदी लोग गांव के कष्टप्रद जीवन में क्यों लौटेंगे।