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राहत कैंप में कब तक रहेंगे बस्तड़ी, उड़मा के लोग

Thu, 07 Jul 2016 10:30 PM IST
संजू पंत/अमर उजाला, बस्तड़ी/डीडीहाट
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राहत कैंप में रुके बस्तड़ी और उड़मा गांव के आपदा प्रभावित - फोटो : अमर उजाला
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राहत कैंपों में रह रहे बस्तड़ी एवं उड़मा के लोगों की लाचारी और बेबसी साफ नजर आती है। वह सिर्फ मजबूरी में कैंप में रह रहे हैं। यदि जल्दी प्रभावितों के लिए जमीन का चयन कर मकान नहीं बने तो कैंपों में रहने वालों के सामने गंभीर संकट खड़ा हो जाएगा।
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पहाड़ पर दो महीने बाद ठंड का मौसम शुरू होने लगेगा। ठंड के मौसम में स्कूल भवनों में रह पाना संभव नहीं होगा। राहत कैंपों में रह रहे लोगों का कहना है कि सरकार जल्दी विस्थापन का काम करेगी, यकीन नहीं होता। इन लोगों की जिंदगी तो बच गई है, लेकिन आगे का जीवन चलाने का संकट बढ़ गया है। अब कहां जानवरों को ले जाएंगे। कहां पर अपना सिर छिपाने के लिए स्थायी ठिकाना मिलेगा, यह कुछ तय नहीं है।

अब नई मुसीबत से हो रहा सामना
उड़मा निवासी पुष्पा देवी जीआईसी में बनाए गए राहत कैंप में रुकी हैं। उनके सारे जानवर गांव में ही हैं। रोज सुबह जानवरों को चारा देने और दूध निकालने के लिए जाना पड़ रहा है। शाम को फिर से दो किलोमीटर की दूरी तय कर जानवरों को चारा देने जाना पड़ रहा है। वह कहती हैं कि यह नई मुसीबत हो गई है।
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सपना के सारे सपने हो गए चूर
राहत कैंप में रुकी 16 वर्षीय सपना हाईस्कूल में पढ़ती हैं। उसने बोर्ड परीक्षा में अच्छे अंक लाने के लिए अभी से पढ़ाई शुरू कर दी थी, लेकिन 30 जून की रात कापी-किताबें बह गई। वह कहती है कि राहत कैंप में रहकर पढ़ाई कर पाना संभव नहीं है। राहत कैंप तो सिर्फ अस्थायी व्यवस्था है। कब तक यहां रह पाएंगे। 

ऐसा मंजर अब तक नहीं देखा
राहत कैंप में रह रही 65 वर्षीय जमुना देवी का कहना है कि प्रकृति का ऐसा कोप जिंदगी में पहले कभी नहीं देखा। बारिश हर साल होती है, लेकिन यह बारिश सब कुछ समाप्त कर देगी, यह सोचा नहीं था। वह कहती हैं कि अब तो बारिश की बूंदे गिरते ही दिल कांपने लगता है। ऐसी बारिश से तो अकाल ही अच्छा। 

भागते नहीं तो मलबे में दफन होते
राहत कैंप में रह रहे केशव भट्ट की आंखों में 30 जून का खौफ बना है। उन्होंने अपने सामने घर, जानवर, संपत्ति और परिजनों को बहते देखा, यदि भागते नहीं तो मलबे में दफन हो जाते। वह कहते हैं कि शेष बची जिंदगी में कितना कष्ट उठाना पड़ेगा, यह सोच कर दिल थर्रा जाता है। 

उस मंजर को याद नहीं करना चाहती
रंजना भट्ट ने अपने परिवार के चार सदस्य आपदा में खो दिए। वह कहती हैं कि उस मंजर को याद करना किसी भयावह सपने जैसा लगता है। उन्होंने कहा कि राहत कैंप के बजाए जल्दी से गांववालों के लिए मकान बनाए जाएं, ताकि वह वहां रह सकें। राहत कैंप में तो बीमार होने का खतरा भी है। 
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