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यहां तो गेहूं, चावल और सब्जी का विकल्प है फांफर और पल्थी

Sat, 17 Sep 2016 10:44 PM IST
कृष्णा गर्ब्याल/अमर उजाला, धारचूला
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जनजातीय गांवों में परंपरागत तरीके से फांफर की रोटी बनाती महिलाएं - फोटो : अमर उजाला
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तिब्बत सीमा पर दारमा और व्यास घाटी के लोगों ने आज भी फांफर और पल्थी (कुट्टू) की खेती से मुंह नहीं मोड़ा है। उच्च हिमालय की जलवायु में अन्य फसलें तो नहीं उग पाती, लेकिन फांफर और पल्थी का उत्पादन खूब हो जाता है। जब फांफर और पल्थी की पत्तियां हरी रहती हैं तब   उनकी सब्जी बनाई जाती है। इनके बीजों को सुखाकर आटा तैयार किया जाता है।
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सीमांत की रं जनजाति के लोग फांफर और पल्थी को देवताओं का भोजन मानते हैं। किंवदंती हैं कि जब पांडव स्वर्गारोहण के लिए निकले थे तो कुंती माता रास्ते में बीमार पड़ गई। भीम अपनी मां के लिए दवा मांगने को महर्षि वेद व्यास के  पास गए। महर्षि वेद व्यास ने व्यास घाटी में ही तपस्या की थी। कहते हैं कि वेद व्यास ने भीम को दवा के रूप में फांफर और पल्थी की रोटी दी थी। दारमा और व्यांस घाटी के कुटी, नागलिंग, गुंजी, नपलच्यू, नाभीढांग गांवों में इस समय करीब 100 नाली क्षेत्रफल में फांफर और पल्थी की फसल उगाई जाती है। माइग्रेशन पर जाते समय अक्तूबर में लोग फांफर और पल्थी के बीजों को बो देते हैं। जब अप्रैल में लौटकर आते हैं तो यह फसल तैयार हो जाती है। हर गांव के लोग इसके बीजों को संग्रह कर रखते हैं। परदेश में रहने वाले अपने परिजनों को भेजते हैं।

आज भी फांफर और पल्थी को सीमांत के लोग बहुत पसंद करते हैं। यह उनकी राशन की जरूरत को भी पूरा करता है। पल्थी (कुट्टू) का आटा 150 रुपये प्रति किलो में मिलता है। इन दिनों माइग्रेशन गांवों  में पहुंचे लोग  पल्थी और फांफर के आटे की रोटी को एक बार जरूर बनाते हैं। इनका लोग संग्रह कर रखते हैं। उच्च हिमालयी क्षेत्र में गेहूं, चावल की उपलब्धता कम रहती है  इसलिए वह फांफर और पल्थी से ही काम चला लेते हैं। यदि किसी परिवार के पास ज्यादा मात्रा में पल्थी और फांफर हुआ तो उसे वह  बाजार में बेच देते हैं।
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औषधीय गुणों से भरपूर है पल्थी, फांफर
पल्थी के आटे को मधुमेह की दवा के रूप में भी प्रयोग करते हैं। इसी तरह के गुण फांफर में भी होते हैं। कहा जाता है कि इस तरह की औषधीय भोजन का प्रयोग करने से सीमांत के लोगों को  डायबिटीज की बीमारी नहीं होती। यह चर्बी और फैट को कम करता है। आयुर्वेद चिकित्सक डा. नवीन जोशी का कहना है कि उच्च हिमालय की ठंडी जलवायु में पैदा होने वाली हर फसल और वनस्पति में औषधीय गुण आ जाते हैं। वह कहते हैं कि  फांफर और पल्थी में सभी पोषक तत्व होते हैं। यह सुपाच्य होता है और शरीर  में जमा चर्बी को कम करता है। 
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