पिथौरागढ़। होली के मद्देनजर बाजार में कई तरह के रासायनिक रंग और प्लास्टिक की पिचकारियां, खिलौने, मास्क बिक रहे हैं। यह बच्चों को आकर्षित भी कर रहे हैं, लेकिन इन रंगों के दुष्परिणाम भी हो सकते हैं।
आधुनिकता की चकाचौंध के बीच हरेला संस्था ने स्थानीय फूलों से प्राकृतिक रंग बनाए हैं। इनका उद्देश्य रंगों के निर्माण के साथ ही स्थानीय स्तर पर आजीविका और प्रकृति संरक्षण को बढ़ावा देना है।
हरेला संस्था ने होली के पर्व को हर्बल रंगों से भर दिया है। संस्था के स्वयंसेवक बुरांश, प्योली, हल्दी, बिच्छू घास, गेंदा, डहेलिया, पालक, मूली, चुकंदर आदि से रंग बना रहे हैं। इन्हें फाल्गुन ऑर्गेनिक होली के नाम से बेचा जा रहा है।
इसका उद्देश्य प्रकृति को संरक्षित कर आजीविका को बढ़ावा देना है। रंगों के निर्माण एवं स्थानीय संसाधनों का दोहन स्थायी प्रबंधन के तहत किया गया है। रंग बनाने से पहले वनों का सर्वेक्षण कर संसाधनों की उपलब्धता आंकी गई।
इसके बाद रंग बनाने की न्यूनतम मात्रा तय की गई। ताकि प्रकृति के सीमित संसाधनों पर अनुचित दबाव न पड़े। रंग से होने वाली आय से संस्था वन संवर्धन और संरक्षण संबंधी कार्य करेगी।
संस्था के मनोज मटवाल ने बताया कि वनों में लगने वाली आग, खरपतवार, कचरा प्रबंधन, रंगों में प्रयुक्त पेड़-पौधों की नर्सरी बनाने का काम स्थानीय ग्रामीणों के सहयोग से किया जाएगा।
रंग निर्माण में लगता है एक हफ्ता
पिथौरागढ़। सोसायटी के स्वयंसेवक रंगों के निर्माण में करीब एक हफ्ते का समय लगाते हैं। जंगलों से चुनकर लाने और फिर खास विधि से इन रंगों को बनाना होता है। सोसायटी ने स्थानीय फूलों के इस्तेमाल से करीब 40 किलो पीला, हरा, गुलाबी और नीला रंग तैयार किया है।
खास विधि से चुने जाते हैं फूल
पिथौरागढ़। एक खास विधि से जंगली पौधों से फूल या पत्तियां चुनी जाती हैं। जमीन पर गिरे फूल एकत्र किए जाते हैं। इन फूलों में से भी सिर्फ आधे फूल ही उठाए जाते हैं। इससे जमीन में ह्यूमस की मात्रा बनी रहे।
उस फूल-पत्ती पर आधारित वन्य-जीवन को भी नुकसान न हो। पेड़ों और पौधों से ताजा फूल चुने जाते हैं। इनकी संख्या सिर्फ एक, चौथाई होती है, ताकि पौधे को प्राकृतिक रूप से बढ़वार का मौका मिलता रहे।
रंगों से होने वाली आय के एक-चौथाई हिस्से को स्थानीय वनों के संवर्धन और प्रबंधन के लिए खर्च किया जाएगा। हर्बल रंग तैयार करने का उद्देश्य लोगों को प्रकृति के संरक्षण के लिए प्रेरित करना है।
-सोनू शर्मा, हरेला सोसायटी
प्लास्टिक के प्रयोग से बचने के लिए रंगों की पैकिंग कपड़ों की थैलियों में की गई है। ये रंग पूर्ण रूप से जैविक, भारी तत्व रहित और त्वचा के लिए लाभकारी हैं। हर्बल रंगों से होली मनाने का मजा अलग ही होता है।
-भार्गव पुनेड़ा, हरेला सोसायटी
रासायनिक रंगों के इस्तेमाल से त्वचा भी खराब हो जाती है। आंखों पर रंग पड़ने से आंखें खराब होने का डर रहता है। मुंह में रंग जाने पर छाले पड़ जाते हैं। रासायनिक रंग लगने से होठ एकदम शुष्क हो जाते हैं।
-डॉ. एचसी पंत, सीएमओ, पिथौरागढ़।