महान सर्वेयर पंडित नैन सिंह रावत को गूगल ने उनके 187वें जन्मदिन पर डूडल में जगह देकर एक बार इस सर्वेयर की उपलब्धियों को टटोलने का मौका दिया है। यहां मुख्य चौराहे पर पंडित नैन सिंह की प्रतिमा के सामने हुए कार्यक्रम में लोगों ने पंडित नैन सिंह के भाई किशन सिंह को भी याद किया। गूगल पर लगभग 2.6 करोड़ लोगों ने अब तक लाइक किया है। ट्वीटर पर भी शुभा मुदगल कई हस्तियों ने इस सर्वेयर को याद किया।
बताया जाता है कि सर्वे के दौरान किशन सिंह ने भी नैन सिंह का साथ दिया था। पंडित नैन सिंह ने सीमांत जिले को अलग पहचान दी और कई लोगों ने उन पर शोधकार्य भी किए। इस दौरान थियो फिलिप, वीरू बुग्याल, नरेंद्र कुमार, महेश रावत, पुष्कर, गोकुल, नरीराम आदि शामिल थे। पंडित नैन सिंह की प्रतिमा यहां पर पांच साल पहले लगाई गई थी। तब से हर साल उनके जन्मदिन पर लोग उनको याद करते हैं।
21 अक्तूबर 1830 को मुनस्यारी में तिब्बत सीमा से सटे अंतिम गांव मिलम में जन्मे पंडित नैनसिंह रावत के पिता का नाम अमर सिंह था। उनको लोग लाटा बूढ़ा के नाम से जानते थे। पंडित नैन सिंह रावत ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा गांव में ही हासिल की, लेकिन आर्थिक तंगी के कारण जल्द ही पिता के साथ वह भारत और तिब्बत के बीच चलने वाले पारंपरिक व्यापार से जुड़ गए। हिंदी एवं तिब्बती के अलावा उन्हें फारसी और अंग्रेजी का भी अच्छा ज्ञान था।
इस महान अन्वेषक और मानचित्रकार ने अपनी यात्राओं की डायरियां भी तैयार की थी। पंडित नैनसिंह के अलावा उनके भाई मणि सिंह, कल्याण सिंह और चचेरे भाई किशन सिंह ने भी मध्य एशिया का मानचित्र तैयार करने में भूमिका निभाई थी। इन्हें जर्मन भूगोलवेत्ताओं एडोल्फ और रॉबर्ट ने सबसे पहले सर्वे का काम सौंपा था।
सर्वे आफ इंडिया ने दस अप्रैल 1802 को ग्रेट ट्रिगोनोमैट्रिकल सर्वे (जीटीएस) की शुरुआत की थी। इस सर्वे का उद्देश्य भारतीय उपमहाद्वीप के अलावा मध्य एशिया और महान हिमालय का मानचित्र तैयार करना था। पंडित नैनसिंह की जीवनी में उल्लेख है कि वह 1863 तक मिलम के स्कूल में शिक्षक रहे। तभी से उनको पंडित कहकर संबोधित किया जाने लगा। पंडित नैन सिंह और उनके भाई किशन सिंह 1863 में जीटीएस से जुड़े और नैन सिंह 1875 तक तिब्बत की खोज में लगे रहे।
जीटीएस के अंतर्गत पंडित नैन सिंह ने काठमांडू से लेकर ल्हासा और मानसरोवर झील का नक्शा तैयार किया। इसके बाद वह सतलुज और सिंध नदी के उद्गम स्थलों तक गए। उन्होंने 1870 में काशगर मिशन और 1874 लेह मिशन पर काम किया। पंडित नैन सिंह को लेह से ल्हासा तक तिब्बत के उत्तरी भाग का मानचित्र तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी। उनका सबसे कठिन दौरा 15 जुलाई 1874 को लेह से शुरू हुआ था, जो उनकी आखिरी खोज यात्रा भी साबित हुई। इसमें वह लद्दाख के लेह से होते हुए ल्हासा और फिर असम के तवांग पहुंचे थे। इस यात्रा के दौरान उन्होंने कई महत्वपूर्ण जानकारियां जुटाई। जो बाद में बहुत उपयोगी साबित हुई। उन्हें ल्हासा से बीजिंग तक जाना था, लेकिन ऐसा संभव नहीं हुआ। पंडित ने लेह से लेकर उदयगिरी तक 1405 मील की यात्रा की थी। द जियोग्राफिकल मैगजीन में 1876 में पहली बार उनके कार्यों पर लेख प्रकाशित हुआ था।
पंडित नैन सिंह को कई पुरस्कार मिले
रायल जियोग्राफिकल सोसायटी ने पंडित नैन सिंह को स्वर्ण पदक देकर सम्मानित किया था। उन्हें स्वर्ण पदक देते हुए कर्नल युले ने कहा था कि किसी भी अन्य जीवित व्यक्ति की तुलना में एशिया के मानचित्र तैयार करने में उनका योगदान सर्वोपरि है। पेरिस के भूगोलवेत्ताओं की सोसायटी ने उन्हें स्वर्णजड़ित घड़ी दी। ब्रिटिश सरकार ने 1877 में उन्हें ‘भारतीय साम्राज्य का साथी’ की उपाधि से नवाजा। उन्हें रुहेलखंड में एक गांव जागीर के रूप में और साथ में 1000 रुपये दिए गए थे। भारतीय डाक विभाग ने उनकी उपलब्धि के 27 जून 2004 को उन पर डाक टिकट निकाला था। उनकी यात्राओं पर कई किताबें प्रकाशित हुई हैं। इनमें डेरेक वालेर की द पंडित, डॉ. शेखर पाठक एवं उमा भट्ट की ‘एशिया की पीठ पर पंडित नैन सिंह रावत जीवन अन्वेषण तथा लेखन’ और डॉ. राम सिंह की पंडित नैन सिंह की डायरी महत्वपूर्ण हैं। इस महान अन्वेषक का 1 फरवरी 1895 में दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया।
नैन सिंह की याद में पर्वतारोहण संस्थान खुला
महान सर्वेयर पंडित नैनसिंह की याद में 21 अक्तूबर 2015 को मुनस्यारी के बलाती में पर्वतारोहण प्रशिक्षण संस्थान खुला। इस संस्थान की प्रथम विशेष कार्याधिकारी पर्वतारोही रीना कौशल धर्मशक्तू को बनाया गया। संस्थान के माध्यम से हर साल साहसिक खेल गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाता है।