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पिथौरागढ़ में स्वर्णिम मशाल ने दिलाई 1971 की शौर्य गाथा की याद

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पिथौरागढ़ के वार मेमोरियल में स्वर्णिम मशाल का बैंड की धुन से स्वागत करते जवान। संवाद - फोटो : PITHORAGARH
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पिथौरागढ़। पाकिस्तान पर शानदार विजय के 50 वर्ष पूरे होने पर पिथौरागढ़ पहुंची स्वर्णिम विजय मशाल ने भारतीय सैनिकों की 1971 की शौर्य गाथा की याद दिला दी। स्वर्णिम विजय मशाल को देखकर मोर्चे पर दुश्मनों के दांत खट्टे करने वाले वीर सैनिकों और युद्ध में शहीद हुए परिजनों के सिर गर्व से ऊंचे हो गए। सभी ने गर्मजोशी से ऐतिहासिक स्वर्णिम विजय मशाल का स्वागत किया।
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मंगलवार को देश के विभिन्न शहरों से घूमकर पिथौरागढ़ पहुंची स्वर्णिम विजय मशाल को सम्मान के साथ वार मेमोरियल लाया गया। इस दौरान पूरा सैन्य क्षेत्र भारत माता की जय के नारों से गूंज उठा। स्टेशन कमांडर ब्रिगेडियर एसके मंडल (सेना मेडल) और सेवानिवृत्त ले. कर्नल एसपी गुलेरिया स्वर्णिम विजय मशाल को वार मेमोरियल में ले गए। इसके बाद 16 कुमाऊं, 6 गढ़वाल राइफल्स, 2119 एफडी अस्पताल, एमएच, 130 इनफैंट्री बटालियन (टीए) कुमाऊं, 1971 के युद्ध में शामिल सैन्य अधिकारी, जवानों, शहीदों की वीरांगनाओं, 119 इनफैंट्री ब्र्रिगेड के सैन्य अधिकारियों ने पुष्प चक्र अर्पित कर शहीदों को नमन किया।
ब्रिगेडियर एसके मंडल ने 1971 की स्वर्णिम विजय मशाल की शौर्य गाथा को विस्तार से बताया। उन्होंने बताया कि 1971 के युद्ध में भारतीय सेना ने पाकिस्तान के 93 हजार सैनिकों को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर कर दिया था। उन्होंने कहा कि यह सेना के साथ ही हमारे देश के लिए गर्व की बात है। इसके बाद 1971 में शहीद हुए सैनिकों की वीर नारियों और युद्ध में पराक्रम दिखाने वाले पूर्व सैन्य अधिकारियों और सैनिकों को सम्मानित किया गया। कार्यक्रम का संचालन कै. दीवान सिंह वल्दिया (सेवानिवृत्त) ने किया।
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6 गढ़वाल के जवानों ने बजाईं धुनें
पिथौरागढ़। स्वर्णिम विजय मशाल के पहुंचने पर 6 गढ़वाल के हवलदार बलदेव सिंह के नेतृत्व में जवानों ने धुनें बर्जाइं। मशाल के गेट पर पहुंचने पर बाइगुल फाइन पेयर, मशाल को रिसीव करते समय स्वागत धुन और मशाल को पार्क में रखते समय फ्लॉवर ऑफ द फॉरेस्ट धुन बजाई।
इन वीर नारियों को किया गया सम्मानित
पिथौरागढ़। 1971 की लड़ाई में शहीद हुए 17 कुमाऊं के सैनिक नायब सूबेदार शिव सिंह की वीरांगना चंद्रा देवी, हवलदार नैन सिंह की वीरांगना कुुसुमा देवी, 17 कुमाऊं के सैनिक लक्ष्मण सिंह की वीरंगना बसंती देवी को सम्मानित किया गया।
इन युद्धवीरों का हुआ सम्मान
पिथौरागढ़। महाराज के पार्क में स्थित वार मेमोरियल में स्वर्णिम विजय मशाल के पहुंचने पर 1971 की लड़ाई के गवाह रहे वीर सैनिकों को सम्मानित किया गया। आर्टिलरी के लेफ्टिनेंट कर्नल सत्यपाल गुलेरिया (सेवानिवृत्त), सिग्नल रेजीमेंट के ऑनरेरी कैप्टन गोपाल सिंह, 6 कुमाऊं के ऑनरेरी कैप्टन दीवान सिंह वल्दिया, बंगाल इंजीनियरिंग के सूबेदार मेजर ऑनरेरी कैप्टन बहादुर सिंह, सूबेदार भूपाल दत्त भट्ट, लांसनायक लीलाधर बिष्ट, सूबेदार आन सिंह, ईएमई के सूबेदार पीएन भट्ट, सूबेदार दिनेश चंद्र, नायक ईश्वर सिंह को सम्मानित किया गया।
बीसी जोशी आर्मी पब्लिक स्कूल भी पहुंची स्वर्णिम विजय मशाल
पिथौरागढ़। वार मेमोरियल से स्वर्णिम विजय मशाल जनरल बीसी जोशी आर्मी पब्लिक स्कूल लाई गई। स्वर्णिम विजय मशाल का स्कूल के शिक्षकों, छात्रों और एनसीसी कैडेट ने भव्य स्वागत किया। बरेली से पिथौरागढ़ पहुंची मशाल को बारहवीं के छात्र विवेक कठायत और निकिता ने ग्रहण किया। इस दौरान पूरा क्षेत्र भारत माता की जय से गूंज उठा। एसओटू चेयरमैन एजूकेशन ऑफीसर कर्नल पुष्पेंद्र, सीओ 16 कुमाऊं कर्नल विक्रम सदहोत्रा, मेजर मनोज रौतेला, कार्यवाहक प्रधानाचार्य रविंद्र सिंह सौन, संजय मसीह, सुनीता चौहान, एनसीसी प्रभारी विनय कुमार भट्ट उपस्थित रहे। शिक्षक शिक्षिका डॉ. नरेश कापड़ी, रेखा कापड़ी, पूनम वल्दिया ने भारतीय सेना के सपूतों के शौर्य और पराक्रम से अवगत कराया।
सांबा सेक्टर में पाक बमबारी में सेक्शन कमांडर को शहीद होते देखा
पिथौरागढ़। मुनस्यारी निवासी सेवानिवृत्त नायक ईश्वर सिंह धर्मशक्तू 1971 के युद्ध में सांबा सेक्टर में तैनात थे। उन्होंने बताया कि तीन दिसंबर को पाक के साथ युद्ध शुरू होने की जानकारी उच्चाधिकारी ने दी थी। इसके बाद सांबा सेक्टर में हर तरफ बमबारी, धूल के गुबार और आग उगलती बंदूकें और तोपें ही दिखाईं देतीं थीं। अगल-बगल कौन था पता ही नहीं चलता था। एक बंकर से निकले तो दूसरे बंकर में पहुंचते। मिट्टी पर सोए रहते थे। जैसे ही दुश्मन हमला करता था, वैसे ही मोर्चा संभालकर उसे पीछे खदेड़ दिया जाता था। फिर कुछ देर तक युद्ध मैदान में सन्नाटा छा जाता था। कुछ देर के आराम के बाद फिर से गोलियां और तोप के गोलों की आवाजें सुनाईं देती थीं। युद्ध के दौरान सेक्शन कमांडर त्रिलोक सिंह लीड कर रहे थे। सभी सैनिक उनके पीछे चल रहे थे। इस दौरान अचानक पाकिस्तान की वायु सेना ने बमबारी शुरू कर दी, जिसमें सेक्शन कमांडर देश के लिए लड़ते हुए शहीद हो गए। बम से निकले छर्रे उनके सिर पर लगे। 17 दिसंबर को सीजफायर के बाद युद्ध समाप्त हो गया।
1971 की लड़ाई में शामिल नैन सिंह की पत्नी को छह माह से पेंशन नहीं
पिथौरागढ़। 1971 के युद्ध में शामिल निशनी निवासी बंगाल इंजीनियरिंग के हवलदार नैन सिंह की पत्नी कुसमा देवी (63) को छह माह से पेंशन नहीं मिली है, जिसके लिए उन्होंने कई अधिकारियों के चक्कर भी काटे। पिथौरागढ़ में स्वर्णिम मशाल के पहुंचने पर युद्ध वीरों और शहीदों की वीरांगनाओं को सम्मानित करने के लिए बुलाया गया था। यहां कुसमा देवी और उनके पुत्र बहादुर सिंह ने सेना के अधिकारियों और जिला सैनिक कल्याण अधिकारी ले. कर्नल वीरेंद्र प्रसाद भट्ट को उन्हें छह माह से पेंशन नहीं मिलने की जानकारी दी। अपने संबोधन में स्टेशन कमांडर ब्रिगेडियर एसके मंडल ने कहा कि पूर्व सैनिकों की समस्याओं के समाधान हर हाल में किया जाएगा।

ार मेमोरियल में स्वर्णिम विजय मशाल को स्थापित करने के बाद सेल्यूट करते ब्रिगेडियर एसके मंडल सेन?- फोटो : PITHORAGARH

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