फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

इसी साल होना था रिटायरमेंट, उससे पहले ही देश के लिए न्यौछावर कर दी जिंदगी

Sun, 03 May 2020 08:12 PM IST
हल्द्वानी ब्यूरो महेंद्र जंगपांगी/जीवन दानू, अमर उजाला, पिथौरागढ़
विज्ञापन
शहीद गोकर्ण सिंह - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

जम्मू-कश्मीर के उड़ी (बारामुला) सेक्टर में शहीद हुए नापड़ गांव निवासी 41 वर्षीय 21 कुमांऊ रेजीमेंट के हवलदार गोकर्ण सिंह चुफाल इसी साल दिसंबर में सेवानिवृत्त होने वाले थे। इसके लिए वह फरवरी में ही पत्नी के साथ संयुक्त खाता खोलने के लिए नाचनी बैंक में आए थे। उनके शहादत की सूचना से हर कोई स्तब्ध है।

विज्ञापन


मुनस्यारी विकासखंड के नापड़ निवासी गोकर्ण सिंह(41) पुत्र गंगा सिंह 21 कुमांऊ रेजीमेंट में तैनात थे। वह 16 दिसंबर 1996 को सेना में भर्ती हुए थे। बच्चों की शिक्षा के लिए उन्होंने पत्नी गीता, पुत्र मनीष (15) और पुत्री चांदनी (13) को बरेली में किराए के मकान में रखा था। गोकर्ण सिंह के माता-पिता का देहांत हो चुका है।

उनके शहीद होने की सूचना जैसे ही गांव में पहुंची किसी को भी सहसा यकीन नहीं हुआ। गोकर्ण का छोटा भाई नरेश चुफाल और उसकी पत्नी बदहवाश हो गए। गोकर्ण ने खतेड़ा हाई स्कूल से पढ़ाई की थी। उन्हें इसी वर्ष दिसंबर में सेवा पूर्ण कर घर आना था। नाचनी निवासी गोकर्ण के साडू भाई गोपाल सिंह कोश्यारी ने बताया कि इस दुखद घटना के बाद शहीद गोकर्ण सिंह की पत्नी और बच्चे बरेली से गांव आ रहे हैं।

 

विज्ञापन
विज्ञापन

सहपाठियों को नहीं हो रहा विश्वास

शहीद गोकर्ण के बचपन के सहपाठी तारा सिंह चुफाल प्राथमिक विद्यालय नापड़ में शिक्षक हैं। उत्तराखंड पुलिस में कार्यरत नरेंद्र चुफाल और कमल चुफाल गोकर्ण की शहादत से
काफी दुखी हैं। उन्होंने कहा कि गोकर्ण ने देश के लिए अपना बलिदान दे दिया है। पूरे क्षेत्र में शोक की लहर है।

गोकर्ण भी पिता भी सेना में थे कार्यरत
सीमा पर शहीद हुए गोकर्ण के पिता स्व. गंगा सिंह चुफाल भी सेना में कार्यरत थे। गंगा सिंह की मृत्यु दो साल पहले हो गई थी। गोकर्ण दो साल पहले ही काठगोदाम से पोस्टेड होकर उड़ी सेक्टर गए थे। शुक्रवार की शाम 7.30 बजे सबसे पहले गोकर्ण के मित्र कुंदन चुफाल को उनकी शहादत की खबर मिली।

शहीद के गांव में नहीं है संचार सुविधा
सीमांत जिला पिथौरागढ़ वीरों की भूमि रही है। देश की सुरक्षा में अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले इन गांवों का आज भी कोई सुधलेवा नहीं है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि थल के नापड़ गांव में आज तक संचार सुविधा नहीं है। नापड़ गांव में मोबाइल के सिग्नल नहीं आते हैं। ग्रामीणों को घरों से दूर ऊंचाई पर जाकर मोबाइल से संपर्क करना पड़ता है।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें