नाचनी (पिथौरागढ़)। उत्तराखंड में प्रचुर मात्रा में उत्पादित होने वाला औषधीय गुणों से भरपूर चूख (नींबू प्रजाति का फल) का काढ़ा घी के बराबर की कीमत पर बिक रहा है। इसका उपयोग लोग मुख्य रूप से गर्मियों में चटनी बनाने के लिए करते हैं। पहाड़ के लोग चूख को जाड़ों में दही, भांग के बीज, मिर्च और नमक मिलाकर चाव से खाते हैं।
पहाड़ में संतरा और माल्टा के साथ ही यह फल नवंबर-दिसंबर में तैयार हो जाता है। चूख के रस का गांवों में काढ़ा भी बनाया जाता है। एक बोतल काढ़ा छह से सात सौ रुपये में बिकता है। नींबू के इस शुद्ध काढ़े की शहरों में भी अच्छी मांग रहती है। दिल्ली, लखनऊ, हल्द्वानी सहित अन्य शहरों में बस चुके लोग पहाड़ से हर साल चूख का काढ़ा मंगाते हैं। इस काढ़े का प्रयोग चटनी या भोजन में स्वाद बढ़ाने के लिए किया जाता है।
ऐसे होता है तैयार नीबें का काढ़ा
काढ़ा बनाने के लिए चूख का रस परंपरागत तकनीक से निकाला जाता है। इसके लिए लकड़ी का एक सांचा होता है, जिसे एक दूसरी लकड़ी से दबाकर रस निकाला जाता है। पहाड़ के गांवों में प्राकृतिक रूप से निकाले गए चूख के रस को तांबे के बर्तनों में उबालकर पकाया जाता है। काला होने पर इसके काढ़े को कांच की बोतलों में भरकर रख दिया जाता है।
जूस भी होता है बेहद स्वादिष्ट
पिथौरागढ़। पहाड़ में बड़ा नींबू बहुतायत में मिलता है। पहले लोग इसका केवल काढ़ा बनाते थे, लेकिन अब इसका जूस भी बनाया जाने लगा है। माल्टा या संतरे की तरह इसका रस निकालने के बाद इसमें चीनी मिलाने के बाद इसे रख दिया जाता है। गर्मियों में पानी मिलाकर इसका सेवन किया जाता है। पहाड़ के सभी बाजारों में चूख के ताजे फल 40 से 50 रुपये किलो बिक रहे हैं।
नींबू में पोटेशियम, लोहा, सोडियम, मैग्नीशियम, तांबा, फॉस्फोरस, क्लोरीन समेत प्रोटीन, वसा, कार्बोज भी पर्याप्त मात्रा में होता है। विटामिन सी से भरपूर नींबू शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के साथ ही एंटी ऑक्सीडेंट का काम करता है। यह कोलेस्टरॉल लेवल कम करने के साथ पेट के कीड़ों को खत्म करता है। पेट दर्द में, भूख बढ़ाने के लिए भी नींबू का प्रयोग किया जा सकता है। इस का बॉटनिकल नेम सिट्रस आरेंटिफोलिया है। यह रक्तस्राव को भी बंद कर देता है। आयुर्वेद में पित्त, कफ विकारों को ठीक करने के लिए इसका उपयोग किया जाता है।
- डॉ. हरीश धर्मशक्तू, प्रभारी चिकित्साधिकारी, राजकीय आयुर्वेदिक चिकित्सालय नाचनी।