समस्याओं का अंबार गांव के गांव खाली करा रहा है। इन गांवों में ओझा तल्ला और मल्ला भी शामिल हो गए हैं। 55 परिवारों वाले तल्ला, मल्ला ओझा में अब केवल 20 परिवार रह गए हैं। 2006 में ये दोनों गांव मोटर सड़क से जुड़ गए थे, लेकिन गांव छोड़ने वालों का क्रम बदस्तूर जारी है। सड़क बनने के बाद गांव से जाने में और तेजी आई है।
वर्ष 2006 से पहले तल्ला ओझा में 25 परिवार रहते थे। लोगों को उम्मीद थी कि सड़क बनने के बाद एवं सुविधाओं की ओर भी जनप्रतिनिधि और सरकार ध्यान देंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार के अभाव में लोग एक-एक कर गांव छोड़ते गए। रमेश चंद्र ओझा, दामोदर ओझा, हरीश चंद्र ओझा, ललित मोहन ओझा समेत 15 परिवार गांव से चले गए। हालात यह हैं कि अब गांव में मात्र 10 परिवार रह गए। मल्ला ओझा में 30 परिवारों के स्थान पर अब केवल 10 परिवार रह गए हैं।
अभावों के कारण गांव छोड़ने वाले लोगों ने हल्द्वानी, पिथौरागढ़, देहरादून और तराई में अपना ठिकाना बना लिया। गांव में अभावग्रस्त लोग ही रह गए हैं। स्वास्थ्य सुविधा के लिए इलाके के लोगों को आज भी 100 किमी की दौड़ लगानी पड़ती है। बेहतर शिक्षा और रोजगार के साधन आज भी उपलब्ध नहीं हैं। जंगली जानवर खेती उजाड़ रहे हैं। इन हालात में ये गांव कब तक आबाद रहेंगे, कहा नहीं जा सकता।
सरकार, नेताओं को नहीं पड़ता असर
तल्ला ओझा की प्रधान मंजू ओझा, ग्रामीण भावना ओझा, चंद्रा ओझा, क्षेत्र पंचायत सदस्य गोविंदी देवी, ओझा मल्ला के प्रधान मथुरा दत्त ओझा, मीना ओझा, दीपा पंत, हंसा देवी कहते हैं कि सरकार और नेताओं को खाली होते गांवों से कोई लेनादेना नहीं है। सरकार और जनप्रतिनिधि सजग होते तो गांवों की ऐसी दशा नहीं होती।