जर्जर हालत में पहुंचा भागीचौरा का अस्पताल भवन
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प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र भागीचौरा में 15 वर्ष से किसी डॉक्टर की तैनाती नहीं हुई। राज्य गठन के बाद स्वास्थ्य व्यवस्था सुधरने के बजाय और ज्यादा खराब हो गई। राज्य गठन से पहले भागीचौरा अस्पताल में डॉक्टरों के पद कभी रिक्त नहीं रहे, लेकिन वर्ष 2002 से इस अस्पताल में कोई डॉक्टर नहीं आया।
ग्रामीण भागीचौरा कस्बा और उससे लगे गांव के लोगों को स्वास्थ्य की सुविधा देने के लिए 38 वर्ष पूर्व वहां पर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र खोला गया। स्थानीय लोग बताते हैं कि उत्तर प्रदेश के समय तक इस अस्पताल में डॉक्टर आते-जाते रहते थे, लेकिन उत्तराखंड बनने के बाद से इस अस्पताल की दुर्दशा शुरू हो गई। 2002 के बाद से इस अस्पताल में कोई भी डॉक्टर नहीं आया। यही नहीं विगत 6 सालों से अस्पताल में फार्मेसिस्ट की भी स्थायी तैनाती नहीं हुई। अस्पताल के दरवाजे रोज चौकीदार खोल देता है। हफ्ते में एक-दो दिन के लिए यदि फार्मेसिस्ट आ गया तो लोगों को दवा मिल जाती है अन्यथा लोगों को साधारण तकलीफ में भी 20 किलोमीटर दूर डीडीहाट अस्पताल आना पड़ता है।
देखरेख के अभाव में अस्पताल का भवन टूटने की कगार पर आ गया है। अस्पताल के मुख्य भवन में बड़ी-बड़ी दरारें पड़ गई हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि जब अस्पताल से लोगों को कोई सुविधा नहीं मिलनी है तो इसे बंद कर देना चाहिए। मुख्य चिकित्साधिकारी डा. उषा गुंज्याल का कहना है कि जिले में डॉक्टरों की कमी है। कई अस्पताल बिना डॉक्टर के हैं। इसकी जानकारी स्वास्थ्य निदेशालय को दी गई है।