बहादुर राम का परिवार भोजन करते हुए।
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बंगापानी/पिथौरागढ़। आपदा पीड़ितों को 27 जुलाई की रात कभी न भूलने वाला दर्द दे गई है। आपदा ने उनके घर और खेत सब छीन लिए हैं। बंगापानी क्षेत्र के ज्यादातर लोग बेघर हो गए हैं और सरकारी भवनों में बनाए अस्थाई शिविरों में अपने दिन काटने को मजबूर हैं। तमाम परेशानियों के बीच दिन बिता रहे आपदा पीड़ितों को भविष्य की चिंता सता रही है। काम धंधा और बच्चों की पढ़ाई तक बंद है।
बंगापानी के मवानी गांव में आई आपदा में घरबार तबाह होने के बाद से 12 परिवारों ने इंटर कॉलेज के भवन में शरण ली है। इन परिवारों की दिनचर्या इसी स्कूल के एक कमरे में सिमट कर रह गई है। स्कूल के कक्षों में रखी जिन कुर्सी टेबल में पढ़ाई होती थी उनमें छोटे बच्चे कभी कभार खाना खाते नजर आते हैं। बच्चों की पढ़ाई का कोई इंतजाम नहीं है। जब अमर उजाला ने शनिवार को शिविर में पहुंचकर उनकी समस्या जाननी चाही तो इन आपदा पीड़ितों का दर्द छलक गया।
आपदा पीड़ित बुजुर्ग कुंवर राम ने बताया कि अब तक के जीवन में ऐसी विपत्ति कभी नहीं देखी। अभी तो खाना मिल रहा है आगे के दिन कैसे काटेंगे यही चिंता सता रही है। बहादुर राम ने बताया कि पत्नी, बच्चे और मां सहित कुछ छह सदस्यों का परिवार है। आपदा ने बेघर कर दिया है। काम धंधा कुछ नहीं है। बच्चों की चिंता सता रही है। मनोज राम ने बताया कि इसी शिविर में दस दिन पहले बेटा पैदा हुआ है लेकिन गांव में आपदा आने से खुशियां भी नहीं मना पा रहा हूं। बच्चे का नामकरण संस्कार कैसे करूं यह चिंता भी है। बुजुर्ग पदिमा देवी ने बताया कि आज तक उन्होंने ऐसी बारिश नहीं देखी। पूरा गांव और जमीन खतरे में आ गया है। मालवती देवी ने बताया कि यहां पर दिन काटने मुश्किल हो गए हैं। भविष्य में कैसे रहेंगे इसकी चिंता सता रही है। आठवीं कक्षा में पढ़ने वाली नीलम ने कहा कि लॉक डाउन से ही पढ़ाई बंद है। वह नहीं जानती कि आगे क्या होगा।