वर्ष 2016 की आपदा ने बंदरलीमा के स्वादिष्ट मालभोग केले को गायब होने की कगार पर पहुंचा दिया है। बंदरलीमा की जमीन दरकने से केले के बाग नष्ट हो गए। अब यहां 2000 केले के पेड़ों में से बमुश्किल 50 ही बचे हैं।
वर्ष 1944 में गांव के तारा दत्त भट्ट बर्मा से मालभोग केले के पेड़ लाए थे। मालभोग को बंदरलीमा ऐसा भाया कि यह गांव के लोगों का रोजगार का जरिया बन गया। बंदरलीमा के 25 परिवारों में से प्रत्येक परिवार 5 से 6 हजार रुपये एक महीने में मालभोग केले से कमा लेता था। डीडीहाट, कनालीछीना के बाजार में 30 रुपये दर्जन केला बिकता था। मालभोग जिले के अन्य इलाकों में कहीं नहीं है, लेकिन 30 जून 2016 की आपदा में बंदरलीमा में जमीन बुरी तरह दरक गई और 2000 मालभोग केले के पेड़ों से भरे बागान उजड़ गए।
गांव में केवल 40 से 50 पेड़ बचे हैं। आपदा के कारण लोगों ने गांव छोड़ना शुरू कर दिया। नतीजतन गांव में 25 में से अब केवल 21 परिवार ही रह गए हैं। 2016 की आपदा के बाद गांव के गोविंद बल्लभ भट्ट, लीलांबर भट्ट, श्याम दत्त और देवी दत्त के परिवार अन्यत्र बस गए। गांव के कृष्णानंद भट्ट, नवीन चंद्र भट्ट, शेखर भट्ट, प्रकाश भट्ट, कैलाश भट्ट, मोहन चंद्र भट्ट कहते हैं कि केले के बागान नष्ट होने से आजीविका का कोई साधन नहीं रह गया है।
अचूक दवा है मालभोग केला
छिलके सहित खाया जाने वाले मालभोग केले को पेट दर्द, बुखार और डायरिया की अचूक दवा माना जाता है। गांव के लोग इन बीमारियों में मालभोग का ही प्रयोग करते थे। मालभोग उजड़ने के बाद परंपरागत इलाज का यह इलाज भी खत्म हो जाएगा।
डीडीहाट भूमि संरक्षण अधिकारी को भूमि की जांच के निर्देश दिए जा रहे हैं। जरूरी हुआ तो भूमि संरक्षण के उपाय किए जाएंगे।
-अवनेंद्र कुमार चौधरी, कृषि और भूमि संरक्षण अधिकारी, पिथौरागढ़