पहाड़ पर महिलाओं की सहभागिता के बगैर घर, खेती, बागवानी, पशुपालन की कल्पना नहीं की जा सकती। जंगल से घास, लकड़ी लाने के साथ ही बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करना, कलेवा, भोजन की व्यवस्था तो मातृशक्ति के जिम्मे है। यहां की महिलाएं अपने खून, पसीने से धान के खेतों की गुड़ाई पारंपरिक तरीके से करती अक्सर दिख जाती हैं। धान बोने के 10 दिन के बाद अंकुरण होने की स्थिति में हल्की सी गुड़ाई की जाती है।
इस गुड़ाई में बैलों का प्रयोग करने पर धान के अंकुरित पौध उखड़ जाते हैं। इसलिए बैलों का प्रयोग नहीं किया जाता है। बगैर बैलों की सहायता से लकड़ी के गुड़ाई यंत्र जिसे स्थानीय भाषा में दन्याली कहा जाता है से धान की हल्की गुड़ाई की जाती है। इस काम को आमतौर पर करते हैं, जिस परिवार के पुरुष घर से बाहर काम करते हों। काम में किसी और की सहायता लेने में असमर्थ महिलाएं इस काम को स्वयं करतीं हैं। इस बार धान बोने के तीसरे, चौथे दिन से लगातार बारिश होने से जमीन सख्त हो गई, जो अंकुरण में बाधा करती है। इस सख्त हिस्से को दन्याली से तोड़ा जाता है।
नाचनी के रसियाबगड़ मल्लाखोली निवासी जेठानी नंदी देवी, देवरानी मंजू देवी खेत में धान की प्रारंभिक गुड़ाई की। दोनों महिलाओं के पति अन्यत्र काम करते हैं। हल नुमा गुड़ाई यंत्र को सिर में रस्सी बांध हाथ के सहारे से खींचा जाता है। एक व्यक्ति यंत्र चलाता है। इससे जमीन के सख्त हिस्से को तोड़ा जाता है। दिखने में ये काम बेहद अमानवीय सा दिखता है, लेकिन दन्याली काफी धीमी चाल और हल्के से चलाया जाता है, इसमें अधिक श्रम नहीं करना पड़ता। हालात और गरीबी महिलाओं को ये काम करने के लिए मजबूर कर देती है।