तीस जून को आई आपदा के समय क्षतिग्रस्त लकड़ीगाड़-लेजम नहर की मरम्मत के लिए शासन से छह माह बाद भी धन नहीं मिला है। नतीजतन किसानों को 50 हेक्टेयर खेतों तक पानी पहुंचाने में भारी दिक्कत हो रही है। हालांकि, लोगों ने खुद ही श्रमदान से नहर में पानी चलाने का प्रयास तो किया, लेकिन जगह-जगह लीकेज के कारण खेतों तक पानी नहीं पहुंच पा रहा है। ढाई किलोमीटर लंबी इस नहर का निर्माण 1960 में हो गया था। अब तक लोगों के खेतों में बराबर पानी पहुंच रहा था, लेकिन 30 जून की आपदा से नहर इस कदर ध्वस्त हो गई कि अब खेतों तक पानी पहुंचना कठिन हो गया है।
सिंचाई विभाग के अवर अभियंता एलएम उप्रेती ने बताया कि आपदा के तुरंत बाद नहर का सर्वे किया गया और 3.22 लाख रुपए का प्रस्ताव बनाकर शासन को भेजा गया, लेकिन अब तक नहर की मरम्मत के लिए एक पैसा नहीं मिला है। उन्होंने कहा कि फिलहाल विभाग अपने संसाधनों से नहर की थोड़ी मरम्मत करेगा और खेतों तक पानी पहुंचाने का प्रयास करेगा। सिंचाई की सुविधा न मिलने से लोगों के खेत सूखने लगे हैं। गेहूं और मसूर के बीज जमीन से ऊपर नहीं निकल पाए हैं। किसानों में विभाग के खिलाफ भारी गुस्सा है और खेत सूखने से मायूसी भी है।
सरकार को किसानों की चिंता नहीं
लेजम निवासी अशोक चंद का कहना है कि सरकार को किसानों की कोई चिंता नहीं है। छह माह तक एक नहर का बंद रहना यह साबित करता है कि सरकार कितनी धीमी गति से काम करती है। नहर की मरम्मत के लिए बार-बार आग्रह करने पर भी कोई कदम नहीं उठाया जाता। यह किसानों के साथ अन्याय है।
इस बार फसल का उत्पादन गिरेगा
लेजम के किसान रमेश राम का कहना है कि गांव के लोगों की आजीविका का मुख्य स्रोत ही कृषि है। जब तक खेतों में पानी पहुंच रहा था तो उत्पादन ठीक हो जाता था, लेकिन इस बार उत्पादन गिरने के आसार हैं। नहर की श्रमदान से कब तक मरम्मत की जाएगी। लोगों के पास उतने ज्यादा संसाधन भी नहीं होते।