ब्यास घाटी को जाने वाला पैदल रास्ता
- फोटो : अमर उजाला
दारमा और ब्यास घाटी के लोगों के लिए सड़क तो सपना बन चुकी है। इन इलाकों को जाने वाले पैदल रास्तों में सफर करना भी खतरे से खाली नहीं है। सोबला से आगे सेला होते हुए जाने वाले रास्ते पर एक तरफ खड़ी चट्टानें हैं तो दूसरी तरफ नाले बहते हैं। लोग इन कठिन रास्तों से ही आवागमन करने को मजबूर हैं। लोगों ने बताया कि पहाड़ी से पत्थरों के गिरने का खतरा अक्सर रहता है। कई बार तो लोग मौत के मुंह में समा जाते हैं।
देश को आजाद हुए 70 वर्ष बीत गए हैं, लेकिन दारमा और ब्यास घाटी के लोगों को यातायात की सुविधा नहीं मिल पाई है। इस बार लोगों को उम्मीद थी कि प्रदेश के मुख्यमंत्री धारचूला विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, इससे कम से कम यातायात की सुविधा तो मिल जाएगी, लेकिन सरकार ने सड़कों के निर्माण की घोषणा मात्र की। अब तक कोई काम नहीं हो पाया है। क्षेत्र के युवा सामाजिक कार्यकर्ता मनोज नगन्याल का कहना है कि लोगों को सिर्फ पुराने रास्तों के भरोसे ही सफर करना है। सरकार के स्तर से कोई कदम नहीं उठाया गया है।
संचार की अब तक कोई सुविधा नहीं
दारमा, ब्यास और चौदांस घाटी के गांवों में संचार की कोई सुविधा नहीं है। धारचूला से आगे बढ़ने पर कोई भी नेटवर्क काम नहीं करता। दारमा, ब्यास घाटी को संचार सेवा से जोड़ने के लिए कई बार घोषणाएं हो गई, लेकिन इन पर अमल नहीं हो पाया है, यदि किसी घटना की सूचना देनी हो तो उसमें भी तीन दिन तक लग जाते हैं।