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अपनी बोली सहेजने में जन्नू दा का जवाब नहीं

Sun, 09 Oct 2016 10:47 PM IST
कालिका रावल/अमर उजाला, पिथौरागढ़
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जनार्दन उप्रेती जन्नूदा - फोटो : अमर उजाला
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किसी भी क्षेत्र की संस्कृति की पहचान वहां की बोली और भाषा से होती है। अपनी संस्कृति के संरक्षण का प्रयास भले ही सरकारी स्तर पर उतना नहीं हो रहा हो, लेकिन जनार्दन उप्रेती उर्फ जन्नू दा पिछले 15 साल से अपनी बोली, भाषा, परंपरा को सहेजने के काम में निरंतर जुटे हैं। वह लोक भाषा में तीन पुस्तकें लिख चुके हैं। सांस्कृतिक महोत्सवों के बेहतरीन उद्घोषक जन्नू दा मेले, महोत्सवों में ऐंण (पहेली), काथ (कहानी) प्रतियोगिता कराने के लिए लोगों को प्रेरित करते हैं।
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जिला मुख्यालय के नजदीक हुड़ेती गांव निवासी 57 वर्षीय संस्कृति प्रेमी जन्नू दा स्थानीय भाषा में गुदड़ि, पुन्थुरि, जमानो बदली ग्यो पुस्तक लिख चुके हैं। जन्नू दा कि ‘कि कुनान अक्षत’ छपने के लिए तैयार है। इस पुस्तक में तीज, त्योहार, ऐंण, काथ आदि को सहेजा गया है। वह इन दिनों स्थानीय भाषा में रामलीला लिख रहे हैं। धनुष यज्ञ तक की कहानी वह लिख चुके हैं। हिंदी में भी कई पुस्तकें लिख चुके हैं। जिले के बेहतरीन उद्घोषकों में शुमार जन्नू दा पुस्तक लेखन से ही स्थानीय बोली, भाषा, रीति, रिवाज, परंपरा का संरक्षण नहीं करते, बल्कि मेले, महोत्सवों में स्थानीय संस्कृति के संरक्षण के लिए लोगों को प्रेरित करते हैं। वह मेले महोत्सवों में ऐंण, काथ की प्रतियोगिता आयोजित कर विजेताओं को इनाम दिलाते हैं।

जन्नू दा को संस्कृति संरक्षण में बचपन से ही गहरा लगाव रहा है। पिता चंद्रशेखर उप्रेती और मां लीलावती उप्रेती से इसकी प्रेरणा मिली। कुमाऊंनी और हिंदी में बचपन से किस्से, कहानी लिखते थे, लेकिन तब यह काम केवल डायरी तक सीमित था। उन्होंने 2001 में पुस्तक लेखन का काम शुरू किया, जो आज तक जारी है। 
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