यौन उत्तेजक यारसा गंबू की तलाश का सीजन शुरू हो गया है। धारचूला और मुनस्यारी के गांवों से सैकड़ों की संख्या में लोग उच्च हिमालय के बुग्यालों को रवाना हो गए हैं। पहले एडवांस पार्टी रवाना हुई है। वह अपने-अपने इलाके में टेंट कालोनी स्थापित कर चुकी है। खाने-पीने का सामान भी बुग्यालों में पहुंचाया जा चुका है। मई प्रथम सप्ताह में दर्जनों गांवों के सैकड़ों लोग यारसा गंबू का संग्रह करने लगेंगे। इस बार कम हिमपात के कारण यारसा गंबू का कवक कम मिलने की संभावना है, फिर भी इसकी ऊंची कीमत का आकर्षण लोगों को अपनी ओर खींच रहा है।
यहां मिली सूचनाओं में कहा गया है कि छिपलाकेदार, जिंबा, उल्का, कठप ग्लेशियर के अलावा पंचाचूली बेस कैंप, व्यास, दारमा घाटी में लोग यारसा गंबू की तलाश के लिए डेरा जमा चुके हैं। धारचूला के खेला, सोसा, रांथी, जुम्मा, गोरीपार, बोना, कनार, गोल्फा, बुई, पातो, मुनस्यारी बंगापानी, जाराजिबली गांवों से लोग रवाना हो गए हैं। यह लोग एडवांस पार्टी के तौर पर जाते हैं।
बताया गया कि बुग्यालों में लोग शिफ्ट में काम करते हैं। गांव की एक टीम करीब 15 दिन तक रहने के बाद दूसरी टीम के आने का इंतजार करती है। तब तक संग्रह किया हुआ यारसा गंबू गांव में पहुंचा दिया जाता है। दूसरी टीम फिर से मोर्चा संभालती है। यह क्रम जून के अंत तक इसी तरह चलता रहेगा। जून में बारिश होने के बाद यारसा गंबू मिलने की संभावना कम हो जाती है।
हिमालय का यारसा गंबू कवक प्रजाति का कीड़ा
दुनिया के देशों में कवकों को औषधीय रूप देने की लगातार कोशिश हो रही है। इसका प्रमाण इस बात से मिलता है कि 1994 में अमेरिका ने कवक उद्योग के रूप में 3.6 मिलियन डालर का व्यापार किया था। हिमालयी क्षेत्र में पाया जाने वाला यारसा गंबू भी एक कवक है। तिब्बती भाषा में यारसा गंबू का अर्थ जाड़े का कीड़ा है। यह फेफड़े की कार्य विधि बढ़ाने के साथ-साथ शुक्राणुजनित रोगों के लिए फायदेमंद बताया गया है। जंतु विज्ञानियों ने यारसा गंबू का वानस्पतिक नाम कारडिसेप्स साइनेंनसिक दिया है। यारसा गंबू को इंटोमोफिलस समूह के अंतर्गत हाइपोसेडेल्ज गण परिवार का सदस्य बताया गया है। यह काले रंग का तंतुकार कवक है, जो 3200 से 4000 मीटर की ऊंचाई वाले इलाकों में पाया जाता है। यह कवक लारवा पर परजीवी के रूप में संक्रमण करता है। राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय पिथौरागढ़ के जंतु विज्ञान विभाग के प्राध्यापक डा. सीएस नेगी ने राष्ट्रीय पादप बोर्ड स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय भारत सरकार के आर्थिक सहयोग से इस पर एक शोधपत्र तैयार किया है। डा.नेगी के अनुसार यारसा गंबू अलग-अलग व्यंजन में अलग-अलग असर करता है। रासायनिक परीक्षण में उन्होंने यह निष्कर्ष भी निकाला है कि यारसा गंबू में विटामिन बी-12, मेनोटाल, कार्डिसेपिक अम्ल, इर्गोस्टाल, 25 से 32 प्रतिशत कार्डोसेपिन और डीपाक्सीनोपिन पाया जाता है।
मोनाल संस्था की टीम लोगों को करेगी जागरूक
मोनाल संस्था की टीम चार मई से उन गांवों में जाकर जागरूकता अभियान चलाएगी, जहां के लोग यारसा गंबू की निकासी के लिए जाते हैं। मोनाल संस्था के सचिव सुरेंद्र पंवार ने बताया उनकी पांच सदस्यीय टीम, जिसमें बृजेश धर्मशक्तू, पुष्कर आर्या, दीपक कोटाल और नितिन शामिल हैं, वह लोगों को उच्च हिमालयी क्षेत्र में यारसा गंबू को खोदने के तरीके, पर्यावरण का कम से कम नुकसान पहुंचाने की जानकारी देंगे।