पिथौरागढ़ में कभी सिनेमा मनोरंजन का प्रमुख और अकेला साधन हुआ करता था। घर-घर टीवी की दस्तक ने सिनेमा कारोबार पर गहरा असर डाला है। शहर के केमू स्टेशन से डाट के पुल तक के बाजार को सिनेमा हाल के कारण ही सिनेमा लाइन कहा जाता है, दर्शकों की बेरुखी के कारण सिनेमा रहा नहीं, रह गई है केवल लाइन।
जिले के गठन के साथ वर्ष 1960 में पिथौरागढ़ में सिनेमा हाल खुला। पांच साल तक सिनेमा हाल का संचालन तिरपाल की छत के नीचे होता था। वर्ष 1965 में भव्य सिनेमा हाल का निर्माण हुआ। मनोरंजन का अकेला साधन होने के कारण पिथौरागढ़ का सिनेमा हाल दर्शकों से गुलजार रहता था। एक दिन में तीन शो चलते थे, जिलेभर से लोग फिल्म देखने के लिए जिला मुख्यालय पहुंचते थे। सिनेमा हाल की 540 सीटें देखते ही देखते बुक हो जाती थी। यहां तक कि ब्लैक में टिकट बिकते थे। यही वही दौर था, जब बड़े पर्दे पर ही फिल्म देखी जा सकती थी।
90 के दशक में टीवी की दस्तक से सिनेमा हाल पर असर पड़ना शुरू हुआ। केबल, डिस टीवी, अब एनरॉयड फोन ने बड़े पर्दे को दुर्दिन दिखा दिए। धीरे-धीरे लोगों का रुझान बड़े पर्दे से कम होने लगा। साल 2008 में 48 साल पुराना सिनेमा का सफर थम गया, यानि कि सिनेमा हाल बंद हो गया।
छिन गया कई का रोजगार
पिथौरागढ़ के सिनेमा हाल के 23 शेयर होल्डर हैं। सिनेमा हाल में 12 कर्मचारी काम करते थे। आसपास की सिनेमा लाइन की दुकानों में लोगों की भीड़ लगी रहती थी। सिनेमा हाल बंद होने से कर्मचारियों का रोजगार तो छिना ही, सिनेमा लाइन की रौनक पर भी इसका असर पड़ा है।
सरकार प्रोत्साहन दे तो किए जा सकते हैं प्रयास : माहरा
सिनेमा हाल के शेयर होल्डर भूपेंद्र सिंह माहरा बताते हैं कि सिनेमा हाल से प्रति माह एक लाख रुपये की रायल्टी सरकार को जाती थी। कहते हैं कई बार सिनेमा हाल को फिर से संचालित करने की कोशिश की गई लेकिन सफलता नहीं मिली। लोग 10 रुपये में भी फिल्म देखने को तैयार नहीं हैं। कहते हैं सरकार प्रोत्साहन दे तो सिनेमा हाल को एक बार फिर से संचालित करने का प्रयास किया जा सकता है।