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कैले बजै मुरुली ऊंचा नीचा डानूं मां...

Sun, 20 Nov 2016 10:56 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, धारचूला
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जौलजीबी मेले में सांस्कृतिक कार्यक्रम पेश करते कलाकार - फोटो : अमर उजाला
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जौलजीबी मेले में शनिवार रात एनएचपीसी नाइट हुई। प्रख्यात कुमाऊंनी गायक स्व. गोपाल बाबू गोस्वामी के बेटे अमित गोस्वामी ने मंच पर अपने पिता के कुछ गीतों की प्रस्तुति दी। उन्होंने कैले बजे मुरुली ऊंचा नीचा डानूं मां गीत गाकर लोगों को भाव विभोर कर दिया। वहीं लोकगायक पप्पू कार्की ने स्वरचित गीत-गिरगौं बटि पुजि गैछ कालामुनि मंदिर सुनाया। एनएचपीसी की धौलीगंगा पावर प्रोजेक्ट के महाप्रबंधक आरके जायसवाल ने मेला संचालन के लिए 50 हजार रुपए का चेक दिया।
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सांस्कृतिक संध्या में जीआईसी बरम, मवानीदवानी, राजकीय हाईस्कूल लुमती, एंजल स्कूल धारचूला के बच्चों के अलावा आनंद म्युजिकल ग्रुप अल्मोड़ा के कलाकारों ने भी धमाल मचाया। महाकाली के तट पर लगे इस मेले में कड़ाके की ठंड के बावजूद भारी संख्या में लोग सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आनंद उठा रहे हैं। धौलीगंगा परियोजना के महाप्रबंधक जायसवाल ने कहा कि यह मेला व्यापारिक और ऐतिहासिक महत्व को दर्शाता है। सहायक मेलाधिकारी आईबी मल्ल ने इस सहयोग के लिए एनएचपीसी का आभार जताया। कार्यक्रम में शकुंतला दताल, लीला बनंग्याल, दौलत पाल, धीरेंद्र धर्मशक्तू आदि मौजूद थे। संचालन लक्ष्मण बिष्ट और करन थापा ने किया।

मेले में पहुंचे हुमला-जुमला के घोड़े
करीब 25 दिन का पैदल सफर तय कर नेपाल के हुमला-जुमला से घोड़ों को लेकर जब व्यापारी रविवार को जौलजीबी पहुंचे तो उनको यह जानकर खासी निराशा हुई कि भारत सरकार ने 500 और 1000 के नोटों का प्रचलन बंद कर दिया है। लोगों के पास इस समय घोड़े खरीदने के लिए बड़ी रकम नहीं है। सात परिवारों के लोग कुल 50 घोड़े लाकर मेले में पहुंचे हैं। सवारी घोड़े की कीमत 50 हजार रुपए और सामान ढोने वाले घोड़ों की कीमत 18 से 36 हजार रुपए तक तय है। नेपाल के घोड़ा व्यापारी पिछले साल तक भारतीय करेंसी लेकर घोड़े बेचा करते थे। इस बार बड़े नोटों का प्रचलन बंद होने की सूचना मिलते ही व्यापारी निराश हैं। हुमला-जुमला के नरबहादुर शाही ने बताया कि वह पिछले 21 वर्षों से जौलजीबी मेले में घोड़ों को बेचने के लिए आ रहे हैं। इस बार भारतीय लोगों के पास रुपए की कमी होने से घोड़ों की बिक्री हो पाना संभव नहीं लग रहा है। उन्होंने कहा कि एक-दो दिन तक माहौल देखेंगे, यदि भारतीय बैंकों में प्रचलित रुपए आने लगेंगे और लोगों को बैंकों से पर्याप्त रुपया मिलने लगेगा तो घोड़ों की बिक्री की संभावना बन सकती है।
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