भारतीय सेना के इतिहास में बेमिसाल वीरता का परिचय देने वाली कुमाऊं रायफल्स इस बार अपना शताब्दी समारोह मना रही है। लंबे संघर्ष के बाद 23 अक्तूबर 1917 को रानीखेत में स्थापित हुई कुमाऊं रायफल्स ने अब तक अपने नाम कई उपलब्धियां जोड़ी हैं। शताब्दी कार्यक्रमों का समन्वय कर रहे सेना के सेवानिवृत्त मेजर जनरल आरके कौशल ने कुमाऊं रायफल्स के इतिहास की जानकारी देते हुए बताया कि 1816 में जब कुमाऊं अंग्रेजी शासन के अधीन आया, तभी से यहां की वीर कौम अंग्रेजी शोषण का शिकार होती रही। इसका ताजा उदाहरण यह था कि 1861 में गढ़वाल रेजीमेंट का गठन हो गया था, लेकिन अंग्रेज कुमाऊं की अलग से कोई सेना बनाने के पक्ष में नहीं थे।
मेजर जनरल कौशल बताते हैं कि प्रथम विश्वयुद्ध के समय कुमाऊं के जांबाजों ने अदम्य साहस का परिचय दिया और अंग्रेजों को कुमाऊंनियों को सेना में भर्ती करने संबंधी अपनी नीति बदलनी पड़ी थी। वह बताते हैं कि 1917 में कुमाऊं रायफल्स का गठन होना किसी उत्सव से कम नहीं था। कुमाऊं के हर घर में नई पल्टन की स्थापना होने पर दिवाली मनाई गई। इसे गंगोलीहाट की आदिशक्ति महाकाली की कृपा मानी गई। एक वीर फौज की शताब्दी के मौके पर मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) कौशल ने कहा कि कुमाऊं के प्रसिद्ध स्थान पिथौरागढ़ में यह आयोजन होगा।
कुमाऊं रायफल्स की सबसे पुरानी यूनिट 3 कुमाऊं इस समय कमान अधिकारी धीरज कुमार सिंह के नेतृत्व में पिथौरागढ़ में तैनात है। वह कहते हैं कि इस गौरवशाली सेना के वीर सैनिकों ने अपनी प्राणों की आहुति देकर इस पल्टन का नाम ऊंचा किया है। यहां की वीरांगनाओं ने कभी भी इस पल्टन के स्वाभिमान को कम नहीं होने दिया। वह लगातार अपने लाडलों को इस सेना में भर्ती कराते आ रही हैं।