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रोड पहुंचने के बाद भी खाली होता गया गांव

Sun, 06 Nov 2016 10:18 PM IST
महेंद्र जंगपांगी/अमर उजाला, थल
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तुरगोली गांव में वीरान पड़ा मकान - फोटो : अमर उजाला
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पहाड़ के गांव खाली होने का मुख्य कारण सड़क सुविधा का न होना माना जाता रहा है, लेकिन थल के पास तुरगोली गांव में सड़क पहुंचने के बाद भी लोगों के जाने का क्रम ज्यादा बढ़ा है। लोग बच्चों को बेहतर शिक्षा देने, रोजगार की तलाश में गांव छोड़कर चले गए। आठ साल के भीतर तुरगोली गांव से 28 परिवार जा चुके हैं, जबकि ठीक उसी समय गांव के लिए सड़क का निर्माण कार्य शुरू हो गया था। ज्यादातर परिवारों की पहली पसंद हल्द्वानी रहा है। इसके अलावा खटीमा, बिंदुखत्ता, देहरादून, पिथौरागढ़, थल बाजार जाकर भी लोग बसे हैं।
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लोगों का कहना है कि गांवों में आजीविका के साधन सिमट रहे हैं। खेतीबाड़ी, फल, सब्जी जंगली जानवरों ने चौपट कर दी है। इनके विपरीत लोगों की जरूरतें बढ़ी हैं। बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाने के साधन नहीं हैं। चिकित्सा की सुविधा नहीं है। तुरगोली ग्राम पंचायत के अंतर्गत आने वाले पांच गांवों में पहले 100 परिवार रहते थे। अब यह संख्या 72 में आकर सिमट गई है। अब भी लोग गांव छोड़कर जाने की तैयारी में हैं। लोगों का कहना है कि सिर्फ सड़क पहुंचने से क्या होगा। गांवों के हालात नहीं बदले हैं। 

पलायन के लिए सरकार जिम्मेदार
तुरगोली निवासी हयात सिंह का कहना है कि पलायन की समस्या के लिए सरकार जिम्मेदार है। राज्य बनने के बाद जब सरकार गांवों की खुशहाली नहीं लौटा पाई तो लोग गांव छोड़ने को विवश हो गए। गांव की खेतीबाड़ी को बंदर, सुअर नहीं रहने देते। स्थानीय स्तर पर रोजगार की कोई संभावना नहीं है। 
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साधन संपन्न लोग पहले चले गए
तुरगोली गांव की सरस्वती देवी कहती हैं कि जिनकी आर्थिक स्थिति अच्छी थी, उन्होंने गांव छोड़ने में कतई देरी नहीं की। जैसे-जैसे लोग आर्थिक साधन जुटा रहे हैं, गांव छोड़ने की तैयारी में लग जाते हैं। वह कहती हैं कि गांव छोड़कर जाना अच्छे लक्षण नहीं है। एक दिन पूरा गांव खाली हो जाएगा। 

शिक्षा और रोजगार की मुख्य समस्या
तुरगोली निवासी छात्रा संगीता सामंत का कहना है कि मुख्य समस्या अच्छी शिक्षा, ट्रेनिंग, रोजगार की है। यदि स्थानीय स्तर पर यह सुविधाएं मिल जाती तो गांव के लोग बड़े शहरों को पलायन नहीं करते। वह कहती हैं कि सरकार को छोटे कस्बों और शहरों में अच्छे प्रशिक्षण संस्थान खोलने चाहिए। 

उत्पादों को बाजार कहां से मिलेगा
तुरगोली निवासी जगदीश कन्याल का कहना है कि यदि कोई स्वरोजगार भी शुरू करना चाहे तो साधन और स्कोप नहीं है। सरकार ने गांवों में मडुवा, सोयाबीन पैदा करने की बात तो की, लेकिन यह नहीं बताया कि इन फसलों की रक्षा कैसे होगी और इनको बाजार कहां से उपलब्ध होगा। इस दिशा में विचार की जरूरत है। 
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