पिथौरागढ़। बेटियां बेटों से कम नहीं होतीं। यदि बेटियों को मौका मिले तो वह हर क्षेत्र में बेटों का मुकाबला कर सकती हैं। सीमांत जिले के महाविद्यालयों में इस बार हुए छात्रसंघ चुनाव में यह बात सही साबित हुई है। महाविद्यालयों में हुए छात्रसंघ चुनावों में महिला सशक्तीकरण की झलक साफ देखने को मिली। इस बार छात्रसंघ में 50 प्रतिशत सीटें महिला आरक्षित होने के बाद भी छात्राओं ने सामान्य पदों पर भी जीत दर्ज कर इतिहास रचा है। एलएसएम परिसर समेत जिले के आठ महाविद्यालयों में इस बार कुल 61 प्रत्याशियों ने भाग्य आजमाया इनमें से 42 छात्राएं शामिल रहीं। परिसर सहित आठ महाविद्यालयों सिर्फ 19 छात्र ही चुनावी रण में उतरे।
इस बार जिले के एलएसएम परिसर, बलुवाकोट, नारायणनगर, मुनस्यारी, गंगोलीहाट, बेड़ीनाग, गणाई गंगोली, मुवानी महाविद्यालय में हुए छात्रसंघ चुनाव में बेटियों की भागीदारी करीब 70 फीसदी रही। वर्ष 1963 में एलएसएम महाविद्यालय (वर्तमान में परिसर) की स्थापना होने के बाद से पहली बार इसमें और अन्य महाविद्यालयों में छात्राओं का दबदबा देखने को मिला। 50 प्रतिशत महिला आरक्षण की सीटों को छोड़ दिया जाए तो 15 बेटियों ने सामान्य सीटों पर चुनावी रण में उतरकर जीत का परचम लहराया। पहली बार छात्रसंघ चुनाव में महिलाओं को समान अवसर देने की पहल ने छात्राओं का हौसला बढ़ाने का काम किया है।
सभी महाविद्यालयों में दावेदारी में आगे रही छात्राएं
इस बार छात्रा उपाध्यक्ष सहित संयुक्त सचिव और कोषाध्यक्ष पद छात्राओं के लिए आरक्षित थे। आरक्षित पदों को छोड़कर छात्राओं ने सामान्य पदों पर भी दावेदारी पेश की। बलुवाकोट, मुवानी, गणाई गंगोली में अध्यक्ष पद पर केवल छात्रा प्रत्याशियों ने ही ताल ठोकी। बलुवाकोट में महासचिव पद पर छात्रा प्रत्याशी ने छात्र प्रत्याशी को चुनौती दी और शानदार जीत हासिल की। एलएसएम परिसर में कुल 19 उम्मीदवारों में से 10 छात्राएं चुनावी मैदान में उतरीं। डीडीहाट में कुल 11 उम्मीदवारों में से 10 उम्मीदवार छात्राएं रहीं। मुवानी महाविद्यालय में दो पदों पर ही चुनाव हुए। दोनों में ही छात्रा उम्मीदवारों ने दावेदारी पेश की और उनके सामने किसी भी छात्र ने मैदान में उतरने की हिम्मत नहीं जुटाई। बलुवाकोट में भी कुल 12 उम्मीदवारों में नौ छात्राएं, मुनस्यारी में कुल पांच उम्मीदवारों में तीन, बेड़ीनाग में कुल चार में तीन उम्मीदवार छात्राएं रहीं। सिर्फ गंगोलीहाट महाविद्यालय ऐसा रहा जहां एक भी छात्रा ने किसी भी पद के लिए दावेदारी पेश नहीं की।