धारचूला (पिथौरागढ़)। पहाड़ के कुछ कस्बे और नगर ऐसे हैं जिनमें चहल पहल किसी खास मौके में ही दिखाई देती है। शेष समय इन कस्बों में निपट सन्नाटा पसरा रहता है। गांवों की इन बाजारों में इक्का दुक्का ग्राहक दिखते हैं। जौलजीबी भी ऐसे ही कस्बों में से एक है। यहां पर सिर्फ जौलजीबी मेले के समय ही आठ-दस दिन तक चहल पहल रहती है। मेला हर साल 14 से 26 नवंबर तक रहता है।
टनकपुर-तवाघाट नेशनल हाइवे में स्थित जौलजीबी कस्बे की पहचान वहां 143 वर्षों से लगने वाले व्यापारिक महत्व के मेले के कारण ही रही है। यह कस्बा कैलास मानसरोवर यात्रा मार्ग पर पड़ता है लेकिन यहां पर यात्री नहीं रुकते। महाकाली और गोरी के संगम पर ज्वालेश्वर का मंदिर है लेकिन वहां भी कस्बे के लोग ही पूजा अर्चना के लिए जाते हैं। हाइवे में चलने वाले वाहन जौलजीबी में ज्यादा नहीं रुकते। जौलजीबी में गर्मियों में अत्यधिक गर्म और जाड़ों में हाड़ कंपाने वाली ठंड रहती है। जाड़ों में जल्दी धूप गायब हो जाती है। जौलजीबी में अब घोर सुनसानी का आलम है।
कस्बों के विकास की योजना बने
धारचूला। जौलजीबी व्यापार संघ के अध्यक्ष राम सिंह पाल, सामाजिक कार्यकर्ता दौलत पाल, शकुंतला दताल, लीला बनग्याल का कहना है कि सरकार को पहाड़ के कस्बों के विकास की योजना बनानी चाहिए। यहां पर पर्यटकों की सुविधा के लिए आवासगृह बनाए जाएं। कुछ सरकारी कार्यालय भी खोले जाने चाहिए।