डीडीहाट। चंचल सिंह बोरा कहते हैं कि 1975 तक लोगों को यह पता नहीं रहता था कि सांसद का चुनाव कौन लड़ रहा है। प्रत्याशी को गांवों में जाने की जरूरत नहीं होती थी। उसे पार्टी के नाम पर वोट मिलते थे। प्रचार कार्यकर्ता करते थे। जिस गांव में कार्यकर्ता जाता था उनका मेहमान की तरह स्वागत होता था। चुनाव आयोग ने मतदान की उम्र हाल ही में 18 वर्ष की है। उससे पहले वोट डालने की उम्र 21 वर्ष होती थी। उससे कम उम्र के नौजवान बड़ी संख्या में मतदान केंद्र में एकत्र हो जाते थे। मतदान के दिन मतदान केंद्रों पर मेला जैसा जुट जाता था।
मतदान केंद्रों में आज की तरह पुलिस की तैनाती नहीं होती थी। लोग खुद ही अनुशासित होकर वोट डालते थे। कहीं पर किसी प्रकार का वैरभाव नहीं दिखता था। 93 वर्षीय चंचल सिंह बोरा हवलदार पद से रिटायर होने के बाद परिवार के साथ तहसील वार्ड में रहने लगे है। वह कहते हैं कि तब कांग्रेस और जनसंघ नाम से ही दो प्रमुख दल थे। बाद में दलों की संख्या बढ़ने लगी लेकिन चुनाव में विकृति भी आने लगी। आज प्रशासन सबसे पहले संवेदनशील और अतिसंवेदनशील मतदान केंद्रों की सूची बना लेता है। तब ऐसी कोई बात नहीं होती थी। वह बताते हैं कि उस दौर में पोस्टकार्ड के माध्यम से ही संदेश पहुंचता था। पोस्टमैन हर गांव के लोगों के लिए चुनाव के समय ऐसे पोस्टकार्ड का बंडल ही लेकर आते थे।
चुनाव के बदलते तौर तरीकों से चंचल सिंह व्यथित हैं। वह कहते हैं कि आज चुनाव में धनबल और बाहुबल का बोलबाला बढ़ रहा है। शराबखोरी बढ़ रही है। कई लोग चुनाव के समय सक्रिय हो जाते हैं और कमाई का धंधा देखने लगते हैं। श्री बोरा का मानना है कि देश में लोकतंत्र मजबूत हो रहा है। लोगों की राजनैतिक चेतना बढ़ रही है लेकिन इसके कई साइड इफैक्ट भी सामने आ रहे हैं। इन पर अंकुश नहीं लगा तो आने वाले समय में शरीफ लोग चुनाव शब्द से ही घबराने लगेंगे।