पिथौरागढ़। सड़क पर घूमने वाले दिव्यांगों के लिए सरकारें अब तक कोई व्यवस्था नहीं कर पाई हैं। सड़कों और गलियों में घूमने वाले कई दिव्यांग तो लावारिस ही मर जाते हैं। जीते जी इनकी पहचान करने के बजाय पुलिस भी इनकी मौत के बाद ही शिनाख्त के प्रयास करती है।
गली, मोहल्लों में घूमते-घूमते यह दिव्यांग भूख मिटाने के लिए शहरी क्षेत्रों को अपना ठिकाना बना लेते हैं। होटल, रेस्टोरेंटों के बचेे खाने से लेकर कूड़े के ढेरों में पड़ी जूठन पर ही जीवित रहने वाले इन दिव्यांगों के आवास, भोजन, इलाज को लेकर कोई व्यवस्था अब तक नहीं हुई है। नतीजतन इन दिव्यांगों को सड़कों के किनारे कुत्तों के झुंड के बीच या कूड़े के ढेरों में ही रात गुजारनी पड़ती है।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इलाज नहीं मिलने के कारण अपना अतीत भूल चुके इन दिव्यांगों की पहचान करने के प्रयास तक प्रशासन की ओर से नहीं किए जाते हैं। आखिरकार कई बीमारियों या भूख प्यास से इनकी अकाल मौत हो जाती है। पुलिस-प्रशासन की ओर से भी मौत होने के बाद ही इनकी शिनाख्त करने की कोशिश की जाती है। शिनाख्त नहीं होने पर इनका लावारिस के रूप से अंतिम संस्कार कर दिया जाता है।
पिथौरागढ़ में घूम रहे एक दर्जन दिव्यांग
पिथौरागढ़ शहर में इस समय लगभग एक दर्जन लावारिस दिव्यांग घूम रहे हैं। जाड़ा शुरू होते ही सड़कों पर घूमने वाले दिव्यांगों की संख्या बढ़ने लगती है। इनमें से अधिकतर दिव्यांग बाहरी हैं। शहर की सड़कों पर घूमने वाले दिव्यांगों में आधी संख्या महिला दिव्यांगों की है।
जिले में नहीं है इलाज की व्यवस्था
दिव्यांगों के इलाज के लिए जिले में कोई व्यवस्था नहीं है। दिव्यांगों की जांच के लिए बरेली या अन्य शहरों में जाना पड़ता है। लावारिस घूमने वाले दिव्यांग भी बीमार या दुर्घटना में चोटिल होते हैं। उनकी कराह सुनने के बाद भी कोई नहीं होता है।
लावारिस दिव्यांगों को रखने के लिए जिले में कोई व्यवस्था नहीं है। समाज कल्याण विभाग के पास इनके भोजन एवं पुनर्वास को लेकर कोई बजट भी विभाग के पास नहीं है। मानसिक दिव्यांग और कूड़ा बीनने वाले लोगों और बच्चों का सर्वे किया जाना है। शीघ्र ही इन्हें चिह्नित कर रिपोर्ट शासन को भेजी जाएगी। -मदन लाल, जिला समाज कल्याण अधिकारी पिथौरागढ़