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कुमाऊंनी बोली की पहचान के लिए लिखी किताब

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पिथौरागढ़। जहां एक ओर अंग्रेजी भाषा का चलन बढ़ता जा रहा है, वहीं दूसरी ओर ऐसे भी लोग हैं जो हाशिए पर जा रही कुमाऊंनी बोली-भाषा के संरक्षण और प्रचार-प्रसार में जुटे हैं। इन्हीं में शामिल हैं कुमाऊंनी कवि जनार्दन उप्रेती जन्नुदा, जिन्होंने बच्चों को केंद्रित कर लिखी ‘कि कूणांन आंखर’ किताब के माध्यम से कुमाऊंनी भाषा को सहेजने का प्रयास किया है।
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‘कि कूणांन आंखर’ किताब में स्वर, व्यंजन और गिनती, पहाड़े से लेकर कई शब्दकोष है। किताब में लिखी गई कुमाऊंनी कविता, कहावतों, मुहावरों और अन्य जानकारियों का अंग्रेजी में अनुवाद भी है। किताब में बरसाक बार मैण (वर्ष के बारह माह), रिस्त-नात, (रिश्ते-नाते), भाण-कुण (घर के बर्तनों के नाम), खाण पिनाकि सामग्री (खाने-पीने की सामग्री), घर में आम बोलचाल और बोली-भाषा के पुराने शब्द, कुमाउंक मुख्य पर्व-बर्त एवं तीज त्यार, कुमाउंक षोडस संस्कार, कुमाउंक लोक उत्सव, कुमाउंक लोक गीतून्कि विभिन्न विधा, कुमाउंकि लोक कला, न्यौलि, लोक शिल्प, कुमाउंक मुख्य वाद्य यंत्र, कुमाउंक प्रसिद्ध लोक नृत्य, कुमाउंक मुख्य देवि द्याप्ता, आण-काथ या ऐण-काथ (पहेलियां), कहावतों को प्रमुखता से शामिल गया है।

हिंदी और अंग्रेजी अनुवाद के साथ लिखी गई इस किताब से कुमाऊंनी आसानी से समझ में आती है। शिक्षक एवं साहित्यकार पीतांबर अवस्थी कहते हैं कि बोली-भाषा को बचाने के लिए सभी को संयुक्त रूप से पहल करने की जरूरत है। किताबों के माध्यम से बोली भाषा का प्रचार-प्रसार इस दिशा में अच्छी शुरुआत है।
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