पिथौरागढ़। भोलेनाथ की इच्छा और आशीर्वाद है जो 22वीं बार लगातार उनके धाम के दर्शन का सौभाग्य मिल रहा है। यदि भोले की कृपा बनी रही तो आगे भी उनके दर्शन का मौका मिलेगा। यह कहना है कि गुजरात के पोरबंदर निवासी अशोक राडिया का।
अशोक राडिया वर्ष 1997 में पहली बार कैलाश मानसरोवर दर्शन को गए। तब से वह लगातार कैलाश दर्शन को जा रहे हैं। कैलाश यात्रा मार्ग के चप्पे-चप्पे से वाकिफ राडिया ने केएमवीएन आवास गृह में अमर उजाला को बताया कि पूर्व में कैलाश यात्रा में सुविधा नहीं थी। यात्री कठिन चढ़ाई व दुर्गम रास्तों से होकर यात्रा करते थे। यात्रा का असली आनंद तभी आता था। किसी के पांव में छाले पड़ते तो कोई कठिन चढ़ाई में हांफते हुए भोलेनाथ का नाम लेकर आगे बढ़ता था।
ठाणीधार और चैतलकोट की कठिन चढ़ाई में यात्रियों की असली परीक्षा होती थी। पूरे कैलाश मानसरोवर यात्रा में मालपा और बूंदी सबसे खूबसूरत स्थल था जो भूस्खलन के चलते तबाह हो गया। उन्होंने बताया कि मालपा हादसे के दौरान वह सातवें दल के यात्री थे और यात्रा पूरी कर वापस लौट रहे थे।
उन्होंने बताया कि तब उन्होंने छियालेख में भेड़िया देखा। भेड़िया देख यात्री रोमांचित हो गए। अब उच्च हिमालयी क्षेत्र मेें वन्य जीव नहीं दिखाई देते। गर्ब्यांग को सोने की मंडी कहा जाता था। नेपाल के छांगरू के लोग कीड़ाजड़ी लेकर वहां बेचने आते थे। मांगती नाले के ऊपर दो डंडे डालकर उसे पार किया जाता था। अब मांगती से बूंदी तक रास्ता अच्छा है। गाला की कठिन सीढ़ियां चढ़नी-उतरनी नहीं पड़ती हैं। सिर्खा से गाला जाते समय रालिंगटाक नहीं जाना पड़ता है।
..
तब दार्चिन से यमद्वार तक 11 किमी पैदल जाते थे
पिथौरागढ़। यात्री राडिया ने चीन में यात्रा के अनुभव भी बताए। उन्होंने बताया कि तब दार्चिन से 11 किमी यमद्वार तक पैदल जाते थे। वहां से भी नौ किमी पैदल यात्रा कर डेरापुक पहुंचते थे। दार्चिन में सुविधा नहीं थी। यात्री और घोड़े, खच्चरों के लिए एक ही तबेला था। इससे उनके बैग आदि सामान खराब हो जाता था। बदबू के चलते यात्रियों का विश्राम ढंग से नहीं हो पाता था। अब काफी सुविधाएं हो गई हैं। यात्रियों को यात्रा में परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता है। उच्च हिमालयी क्षेत्र में आईटीबीपी यात्रियों को सुरक्षित यात्रा कराती है।