पिथौरागढ़। पेयजल संकट के इतर सरकारी मशीनरी की तैयारी अधूरी नजर आ रही है। गर्मी के सीजन से पहले ही लगभग साढ़े पांच लाख आबादी वाले जिले को मांग की तुलना में 50 फीसदी पानी ही मिल पा रहा है। गर्मियों में संभावित संकट को देखते हुए अब तक कारगर कदम नहीं उठाए गए हैं। गर्मियों में पानी की समस्या गहराई तो लाखों की आबादी के बीच पेयजल के लिए हाहाकार मच सकता है।
जिले में बड़ी योजनाओं को छोड़कर अधिकतर इलाके पेयजल एवं अन्य जरूरतों के लिए नौलों और धारों पर निर्भर हैं। इन स्रोतों का डिस्चार्ज लगातार कम हो रहा है। चाल, खाल बनाने, स्रोतों को रिचार्ज करने की बातें तो खूब हुई, लेकिन अब तक इनसे संरक्षण के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए। यही कारण है कि नौले, धारों का पानी लगातार सूखता जा रहा है। प्राकृतिक स्रोत प्रदूषित हो रहे हैं। जिले में 25 से अधिक योजनाएं समस्याग्रस्त हैं। इनका डिस्चार्ज लगातार घट रहा है। दो योजनाएं बंद हो चुकी हैं।
पेयजल संकट के बीच सरकार की संजीदगी का आलम यह है कि सूख रहे स्रोतों को रिचार्ज करने की पुख्ता योजना अब तक नहीं बनाई गई है। बंद पड़ी योजनाओं को पुनर्जीवन देने की योजना भी अब तक नहीं बन सकी है। इनका कोई विकल्प तैयार नहीं किया गया है। दशकों पुरानी पेयजल लाइनों को बदलने की भी योजना ठप पड़ी है।
टैंकर कैसे बुझा पाएंगे लाखों की प्यास
जल संस्थान जिले भर के प्रभावित क्षेत्रों में आपूर्ति के लिए महज कुछ टैंकरों और किराए के पिकअप वाहनों पर निर्भर है। पिथौरागढ़ से लेकर बेड़ीनाग, गंगोलीहाट, डीडीहाट, सीमांत धारचूला तक विकट भौगोलिक परिस्थितियों के बीच चुनिंदा वाहन कैसे लाखों की प्यास बुझा पाएंगे, यह सवाल खुद संभावित संकट से निपटने की तैयारी का जवाब दे रहा है।
40 करोड़ की योजनाओं की धीमी रफ्तार
इस वक्त जिले में जल निगम के पिथौरागढ़, डीडीहाट और गंगोलीहाट डिवीजनों में लगभग 40 करोड़ लागत से अधिक की दर्जनों नई पेयजल योजनाओं पर काम चल रहा है। केंद्र, राज्य एवं जिला मद की ये योजनाएं स्वैप और नॉनस्वैप मोड में बनाई जा रही है। इन योजनाओं के लिए बजट की कोई कमी नहीं है। इसके बावजूद कार्यदायी संस्था का काम धीमी रफ्तार से चल रहा है।
रेन वॉटर हार्वेस्टिंग को किया नजरअंदाज
जल संरक्षण के तहत रेन वॉटर हार्वेस्टिंग को जिले भर में भवन निर्माण के दौरान सिरे से नजरअंदाज किया गया है। आम जनमानस में हार्वेस्टिंग व्यवस्था को लेकर जागरूकता का अभाव नजर आता है। वहीं, जिम्मेदार सरकारी मशीनरी जल संरक्षण को लेकर लापरवाही बरत रही है। छोटे-बड़े किसी भी सरकारी भवन में रेन वाटर हार्वेस्टिंग की योजना नहीं अपनाई गई है।