पिथौरागढ़। 70-80 के दशक में पहाड़ की आवाज हुआ करतीं थीं उत्तराखंड की पहली लोक गायिका कबूतरी देवी। लोग उनकी आवाज के दीवाने हुआ करते थे। कबूतरी को पिता से मिली संगीत की प्रारंभिक शिक्षा और पति के संबल ने ही मुकाम तक पहुंचाया। कबूतरी देवी के चले जाने के बाद उनकी खनकती आवाज सुनने के लिए लोगों के कान तरसेंगे।
चंपावत के डुंगरालेटी गांव देव राम के घर जन्मीं कबूतरी को गायकी विरासत में मिली। उनका जन्म परंपरागत लोग गायकी से जुड़े परिवार में होने से उनका नाता बचपन से ही गीत, संगीत से रहा। गांव में उन्होंने अपने पिता के साथ ही मां देवकी देवी से गायकी की प्रारंभिक शिक्षा हासिल की, जो उस समय के जानेमाने गायक थे।
पिता से संगीत की प्रारंभिक शिक्षा हासिल करने वाली कबूतरी की काबिलियत को उनके पति ने बखूबी परखी और आकाशवाणी और स्थानीय मेलों में गाने के लिए प्रेरित किया। यह वह दौर था, जब पहाड़ की महिला संस्कृतिकर्मी आकाशवाणी के लिए नहीं गाती थीं। पति की प्रेरणा से कबूतरी आकाशवाणी से गीतों की प्रस्तुति देने को राजी हुईं। 70 के दशक में इन्होंने पहली बार पहाड़ के गांव से स्टूडियो पहुंचकर रेडियो जगत में अपने गीतों से धूम मचा दी थी।
आज पनि झौ झौ भोल पनि झौ झौ, पोरखिन त न्है जूंला, स्टेशन सममा पूजै दे मलाई, पछिल बीराना ह्वै जूंला गीत लोगों की जुबां पर छा गया। कबूतरी के गीत पहाड़ों को ठंडो पाणि कि भलि मीठी बाणी, दूर आसमान का तारा, जुन्याली रात आदि गीत लोगों के दिलों पर राज कर गए। कबूतरी पंचम सुर में गाती थीं। उनके गीत आकाशवाणी के रामपुर, लखनऊ, नजीबाबाद, चर्चगेट मुंबई के केंद्रों से प्रसारित हुए। उन्होंने करीब 100 गाने आकाशवाणी से गाए। कबूतरी देवी अपने पति दीवानी राम को नेताजी कहकर पुकारती थीं।
आखिरी सांस तक साथ रहीं हेमंती
कबूतरी देवी का अंतिम समय छोटी बेटी हेमंती के साथ बीता। वह करीब 15 साल से हेमंती के गांव सेरी कुम्डार में रहती थीं। अंतिम समय में भी हेमंती ही साथ रही। बड़ी बेटी मंजू अपने परिवार के साथ खटीमा में रहती है। बेटा भूपेंद्र अपने बच्चों के साथ मुंबई में रहता है।