पिथौरागढ़। पहाड़ पर प्रचलित लोक परंपराओं में हिलजात्रा एक ऐसा आयोजन है, जिसे मुख्य उत्सव के अलावा कई बार रंगमंचीय प्रस्तुति का सौभाग्य मिला है। 35 साल पहले सोरघाटी (पिथौरागढ़) के इस लोक उत्सव का दिल्ली दूरदर्शन से प्रसारण हुआ था। सबसे अहम बात यह है कि इस लोकनाट्य परंपरा को बड़े स्तर के सांस्कृतिक आयोजनों में पांच बार पहला स्थान मिल चुका है। उम्मीद है कि यह विलक्षण लोक परंपरा भविष्य में और ज्यादा प्रचार पाएगी।
हिलजात्रा को राष्ट्रीय स्तर पर प्रचार देने और व्यापकता देने का सारा श्रेय विख्यात रंगकर्मी स्वर्गीय मोहन उप्रेती को जाता है। उन्होंने 1983 में दिल्ली दूरदर्शन से इस लोक परंपरा का प्रसारण कराया। उसके तुरंत बाद पर्वतीय कलाकार संघ ने दिल्ली में हिलजात्रा की मंचीय प्रस्तुति दी थी। उस मंचन में अल्मोड़ा के विख्यात रंगकर्मी स्वर्गीय बृजेंद्र लाल शाह, रंगकर्मी पूर्व विधायक हीरा सिंह बोरा ने भी पात्र की भूमिका निभाई थी।
समय बीता और पिथौरागढ़ की सांस्कृतिक संस्था नवोदय पर्वतीय कला केंद्र ने हिलजात्रा को अपने कार्यक्रमों का मुख्य हिस्सा बना लिया। नवोदय की ओर से अब तक देश के विभिन्न शहरों में हिलजात्रा का मंचन किया जा चुका है। 1996 में रामनगर में हुए पर्वतीय सांस्कृतिक महोत्सव में इस प्रस्तुति को पहला स्थान मिला। उसके बाद जमशेदपुर, सूरजकुंड, टिहरी एवं दिल्ली में भी हिलजात्रा के मंचीय कार्यक्रम हुए और हर बार हिलजात्रा को पहला स्थान मिला।
नवोदय पर्वतीय कला केंद्र के निदेशक हेमराज बिष्ट बताते हैं कि लोक परंपरा के नाट्य रूपांतरण के समय मूल विषय की गरिमा को बनाए रखा जाता है। बताते हैं कि दिल्ली में वर्ष 1999 में हिलजात्रा का मंचन किया गया। कुमौड़ गांव के यशवंत महर, कुंडल महर, जीवन महर और अर्जुन सिंह महर ने पात्रों की जीवंत भूमिका निभाई थी।