थल (पिथौरागढ़)। मशकबीन बजाकर परिवार को पालने की तमन्ना रखने वाले अल्मियागांव निवासी धनीराम को अब 67 वर्ष की उम्र में पहुंचने पर महसूस हो रहा है कि यह काम पकड़कर अच्छा नहीं किया। वह गरीबी में जीवनयापन कर रहे हैं। बारातों का सीजन खत्म होने के बाद घर पर चूल्हा जलाने के लिए उनको मजदूरी करनी पड़ती है।
धनीराम बताते हैं कि उनके पूर्वजों ने कभी यह काम नहीं किया था। परिवार की गरीबी के कारण मात्र कक्षा आठ तक की पढ़ाई करने वाले धनीराम को 18 वर्ष की उम्र में पहुंचते ही परिवार को पालने की चिंता सताने लगी। उन्होंने कहीं से मशकबीन का इंतजाम किया और बारातों में बुलावे पर उसे बजाने के लिए जाने लगे।
वह बताते हैं कि मशकबीन बजाना हर किसी के बस की बात नहीं है। बारातों में आज भी छलिया दलों के साथ मशकबीन (पीपरी बाजा) वाला जरूर होता है। वह कहते हैं कि मशकबीन में गाने माहौल के हिसाब से सेट किए जाते हैं। बारात जाते वक्त ओम जय जगदीश वाली आरती का बाजा बजाया जाता है। उसके बाद माहौल के अनुसार बेड़ू पाको बारामासा, ओहो नरैण काफल पाको चैत या फिर झन जाए भौजी बिलौरी घासा, लागला बिलौरी का घामा जैसे गीत बजाए जाते हैं।
वह 67 वर्ष की उम्र में भी जब मशकबीन में अपने आलाप छोड़ते हैं तो लोग मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। वह कहते हैं कि मशकबीन बजाते समय सांसों और फेफड़ों में काफी जोर पड़ता है। बारातों में जाने पर इतना पैसा नहीं मिलता कि परिवार की सही प्रकार से गुजर-बसर हो सके। अलबत्ता रोजगार का कोई विकल्प न होने के कारण उन्होंने अपने बेटे नरेंद्र प्रसाद को भी मशकबीन बजाना सिखा दिया है। धनीराम कहते हैं कि सरकार लोक कलाकारों को प्रोत्साहन की बात तो करती है, लेकिन आवेदन के बाद भी उनको पेंशन नहीं दी गई। वह कहते हैं कि पहाड़ की कला और कलाकारों को बचाने के लिए ठोस नीति बनाई जाए।