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राज्य बनने के बाद 40 परिवारों ने गांव छोड़ा

Sat, 04 Nov 2017 10:12 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, थल
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पलायन के कारण थल के कौली गांव में पसरा सन्नाटा - फोटो : अमर उजाला
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ग्राम पंचायत लेजम के कौली गांव से राज्य गठन के बाद लोगों के जाने का क्रम ज्यादा बढ़ा है। अब भी लोग गांव छोड़कर जाने की तैयारी में हैं। 2008 में सड़क से जुड़े इस गांव में अन्य तरह की कोई सुविधा नहीं है। शिक्षा, चिकित्सा जैसी सुविधाएं नहीं मिलने से परेशान लोगों ने गांव छोड़कर जाने में ही भलाई समझी और एक-एक कर गांव छोड़ते गए, क्योंकि गांव में खेतीबाड़ी तो होती है, लेकिन जंगली जानवरों के आतंक से लोगों के हाथ कुछ नहीं लगता।
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फल, सब्जियों तक को जानवर चौपट कर देते हैं। राज्य गठन से पहले कौली गांव में 60 परिवार रहते थे, लेकिन 2001 से गांव छोड़कर जाने का क्रम शुरू हो गया। इन 17 वर्षों में 40 परिवार गांव से जा चुके हैं। पहाड़ का यह पहला ऐसा गांव है, जहां से इतनी ज्यादा संख्या में लोगाें ने गांव छोड़ा।

कौली गांव के डॉ. जनक चंद टनकपुर, डॉ. केसी पंत खटीमा, एडवोकेट मनोज गोरकिला दिल्ली, अर्जुन चंद खटीमा, हीरा चंद भोपाल, प्रेम चंद पूना, रघुवर चंद लखनऊ, कमला देवी पिथौरागढ़ जाकर बस गए। कई परिवारों ने हल्द्वानी में जमीन खरीदी और धीरे-धीरे कई परिवार हल्द्वानी जाकर बस गए। गांव के लोग बताते हैं कि राज्य गठन के बाद गांव में किसी तरह की सुविधा नहीं मिली, उल्टा लोगों के गांव छोड़कर जाने का क्रम बढ़ गया। कई परिवार ऐसे हैं, जो अब भी बाहरी शहरों में बसने की तैयारी में लगे हैं। यदि यही स्थिति रही तो आने वाले वर्षों में कौली गांव पूरी तरह खाली हो जाएगा।
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इस हालत के लिए सरकार जिम्मेदार
कौली निवासी गोपाल दत्त पुनेठा का कहना है कि गांव खाली होने के लिए सरकार जिम्मेदार है। जब गांवों में आजीविका के कोई संसाधन ही नहीं होंगे तो लोग कैसे जीवनयापन करेंगे। वह कहते हैं कि गांव में शिक्षा, स्वास्थ्य की कोई सुविधा नहीं है। इस हालत के बाद भी सरकार ने गांव में सुविधा बढ़ाने पर ध्यान नहीं दिया।

अलग राज्य क्यों बना, समझ से परे
कौली निवासी जीतबहादुर चंद का कहना है कि अलग राज्य क्यों और किसके लिए बना, समझ में नहीं आता। इससे साफ जाहिर होता है कि नेताओं ने राज्य गठन की मूल मंशा को ध्वस्त कर दिया और खुद की भलाई में लग गए। यह समस्या एक गांव के साथ नहीं वरन पहाड़ के हर गांव के साथ है। यह समस्या रुकने वाली नहीं है।
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