गोरीपार क्षेत्र के 13 गांवों के 5000 लोगों की विडंबना ही कहा जाएगा कि वह 28 महीने से गोरी के ऊपर बंधी गरारी से आवागमन कर रहे हैं। जून 2013 में आई आपदा के समय गोरी में बसंतकोट के पास बना झूलापुल बह गया था। तब से झूलापुल का निर्माण नहीं हो पाया है। गरारी से गिरकर अब तक दो लोगों की मौत हो गई है और कई लोगों का सामान गरारी से गिरकर गोरी में गिर चुका है। मुख्यमंत्री के विधानसभा क्षेत्र के लोग अब भी गरारी की रस्सी के सहारे जिंदगी जी रहे हैं। इसी गरारी से वह सामान लेने बाजार आते हैं। कोई बीमार हो गया तो उसे भी इसी रास्ते ले जाना पड़ता है।
गोरीपार के बसंतकोट, बोथी, उछैती, धूरातोली, फाफा, रिंगू, चुलकोट, ढीलम, कुलथम, लैंगा, बाजीखड़क, जौलढुंगा और बजानीधार गांव के लोगों ने पिछले दिनों झूलापुल की मांग को लेकर सामूहिक रूप से आमरण अनशन का एलान भी किया था। तब अधिकारियों ने लोगों को आश्वासन दिया कि झूलापुल का निर्माण एक महीने के भीतर शुरू कर दिया जाएगा, लेकिन दो माह बीत गए हैं, झूलापुल का प्रस्ताव तथा सर्वे तक नहीं हो पाया है। ग्रामीणों के आंदोलन का नेतृत्व करने वाले भाजपा नेता जगत मर्तोलिया ने कहा कि यह गरारी लोगों के लिए जी का जंजाल हो गई है। यदि जल्दी झूलापुल नहीं बनता तो गरारी से फिर घटनाएं हो सकती हैं। उन्होंने कहा कि एक बार फिर से झूलापुल की मांग को लेकर आंदोलन छेड़ा जाएगा। यदि सरकार ने तत्काल झूलापुल का निर्माण शुरू नहीं किया तो 13 गांवों के लोग फिर से आमरण अनशन पर बैठेंगे।