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रसगाड़ी के 110 परिवार छोड़ चुके अपनी माटी

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अस्कोट (पिथौरागढ़)। कभी आम, अमरूद, केला उत्पादन के प्रमुख स्थानों में शुमार रसगाड़ी ग्राम पंचायत पर असुविधा की ऐसी मार पड़ी कि 28 साल में 110 परिवार अपनी माटी को छोड़कर दिल्ली, हल्द्वानी, खटीमा, पिथौरागढ़ जैसे शहरों में बस गए। पलायन की सबसे अधिक मार ग्राम पंचायत के मचौरा तोक में पड़ी है, जहां 18 में से मात्र 7 परिवार रह गए हैं। ग्राम पंचायत के लोग अब जंगली जानवरों के आतंक से परेशान हैं, इस कारण अधिकतर लोगों ने खेती छोड़ दी है।
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रसगाड़ी पर वर्ष 1990 से पलायन की मार पड़ी। सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा व्यवस्था के अभाव को देखते हुए सबसे पहले हयात सिंह, सुंदर सिंह, चंचल सिंह आदि ने गांव छोड़ा। देखते ही देखते जमन सिंह, महेंद्र सिंह, मनोहर सिंह, तेज सिंह, चंद्र सिंह, बहादुर सिंह के परिवार भी अपनी माटी का मोह त्यागकर चले गए। एक-एक कर ग्राम पंचायत के मचौरा, गडाली, बिजौरी, तल्ला गडाली, ऊंचाकोट, ओझपाली से 110 परिवार चले गए। 250 परिवारों वाले ग्राम पंचायत में अब मात्र 140 परिवार रह गए हैं। गांव छोड़ने वाले अधिकतर लोग साधन संपन्न हैं, गांव में आर्थिक रूप से कमजोर लोग ही रह गए हैं।

रसगाड़ी में शिक्षा के नाम पर केवल प्राथमिक स्कूल है। इससे आगे की पढ़ाई के लिए 8 किमी दूर अस्कोट और 14 किमी दूर जौलजीबी जाना पड़ता है। स्वास्थ्य सुविधा के लिए अस्कोट पर निर्भरता है। रसगाड़ी, गड़ाली के लोगों को सड़क तक आने के लिए 5 किमी, ओझापाली, बिजौरी के लोगों को 10 किमी की पैदल दूरी नापनी पड़ती रही है।
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जानवरों के आतंक से नहीं मिल रही निजात
रसगाड़ी की प्रधान उमा बिष्ट कहती हैं कि देश की आजादी के सात दशक बाद भी सरकारें ग्राम पंचायत को मूलभूत सुविधा उपलब्ध नहीं करा पाईं। अब जंगली जानवरों के आतंक के कारण लोग ग्राम पंचायत से जा रहे हैं। खेत बंजर पड़े हैं। ऐसे हालात में कौन गांव में रहना चाहेगा।

गांवों में सुविधाओं का विस्तार और गांवों से पलायन रोकने के लिए प्रदेश सरकार गंभीर है। रसगाड़ी ग्राम पंचायत में मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। जंगली जानवरों के आतंक से निजात दिलाने के लिए जड़ीबूटी उत्पादन पर जोर दिया जा रहा है। -विशन सिंह चुफाल, स्थानीय विधायक
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