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आरक्षण नहीं, राज्य गठन की अवधारणा के लिए संघर्ष हो

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पिथौरागढ़। हाइकोर्ट के राज्य आंदोलनकारियों को क्षैतिज आरक्षण असंवैधानिक करार दिए जाने के बाद अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। अधिकतर चिन्हित राज्य आंदोलनकारी अदालत के फैसले से सहमत नहीं हैं और इसे सरकार की कमजोर पैरवी से जोड़कर देखते हैं।
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वहीं वामपंथी और प्रगतिशील विचारों वाले राज्य आंदोलनकारी अदालत के फैसले को सही ठहरा रहे हैं। ऐसे आंदोलनकारियों का मानना है कि आरक्षण की लड़ाई के बजाय राज्य गठन की अवधारणा को साकार करने के लिए संघर्ष किया जाना चाहिए।

आंदोलनकारियों के हितों पर कुठाराघात
राज्य आंदोलनकारी राजेंद्र भट्ट का कहना है कि आरक्षण को असंवैधानिक करार देना आंदोलनकारियों के हितों पर कुठाराघात है। राज्य आंदोलन के दौरान कई लोगों ने अपनी युवावस्था और भविष्य की परवाह नहीं की। जेल गए, मुकदमे झेले, अपाहिज हुए, जान तक दी। आंदोलनकारियों की शहादत और संघर्षों को देखते हुए सरकारी सेवा का लाभ अवश्य मिलना ही चाहिए।
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फैसले पर दोबारा विचार किया जाए
राज्य आंदोलनकारी जनार्दन उप्रेती का कहना है कि राज्य आंदोलन के दौरान कई युवाओं ने अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। कई आंदोलनकारियों का भविष्य चौपट हुआ। वर्तमान में कई लोगों के पास आजीविका का साधन तक नहीं है। सरकारी नौकरी मिलने से आंदोलनकारियों के त्याग की एक हद तक भरपाई होती। न्यायालय को अपने फैसले पर दोबारा विचार करना चाहिए।

सरकार ने नहीं की ठोस पैरवी
राज्य आंदोलनकारी मोहन चंद्र भट्ट का कहना है कि आंदोलनकारियों के लंबे संघर्ष और त्याग के बाद अलग राज्य बना। उनके त्याग को आंका नहीं जा सकता। हालांकि त्याग को देखते हुए जीवन के मुश्किल वक्त में उन्हेें सरकारी सेवा का सहारा मिलना चाहिए। इस मामले में सरकार ने अदालत में ठोस पैरवी नहीं की। अब सरकार को पूरी तैयारी के साथ फैसले के खिलाफ अपील करनी चाहिए।

आरक्षण नहीं अवधारणा के लिए लड़ाई
राज्य आंदोलनकारी गोविंद कफलिया का कहना है कि अदालत का फैसला बिल्कुल ठीक है। संविधान सबको सरकारी सेवा में बराबरी का मौका देता है। राज्य बनने के बाद जो ऊर्जा अलग गठन की अवधारणा के संघर्ष में लगनी चाहिए थी, वो आरक्षण की लड़ाई में खर्च हो रही है। आंदोलन आरक्षण के लिए नहीं किया था। आरक्षण के बजाय राज्य की बदहाली पर सोचना जरूरी है।
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