इसे अच्छा लक्षण ही कहा जाएगा कि जिले में टीबी के मरीजों की संख्या लगातार कम हो रही है। जिला मुख्यालय में स्थित टीबी अस्पताल में इस समय सिर्फ चार मरीज भर्ती हैं। इन मरीजों को देखने के लिए दो डॉक्टरों समेत कुल 20 लोगों का स्टाफ तैनात है। स्टाफ के वेतन में ही सरकार को कम से कम 10 लाख रुपये प्रतिमाह खर्च करना पड़ता है।
जिले में जब से टीबी के इलाज के लिए डॉट्स प्रणाली शुरू हुई, तब से मरीजों की संख्या में लगातार कमी आने लगी, लेकिन अस्पताल का ढांचा अब तक उसी तरह बना हुआ है। हालांकि अस्पताल के अधिकारियों का कहना है कि समय-समय पर लोग संदेह के आधार पर टीबी की जांच के लिए आते रहते है, इसलिए कुछ आवश्यक स्टाफ की तैनाती बेहद जरूरी है। क्षय रोग अस्पताल में यहां दो डॉक्टर, दो फार्मेसिस्ट, दो सफाई कर्मचारी, एक धोबी, एक कुक, दो वार्ड आया, आठ नर्स, एक एक्सरे टेक्नीशियन, एक रात्रि चौकीदार तैनात हैं। कर्मचारियों का कहना है कि अस्पताल में भर्ती होने वाले मरीजों की संख्या कम होने से काम भी नाममात्र का है। सिर्फ उन मरीजों को ही भर्ती किया जाता है जो घर पर नियमित रूप से दवा लेने में लापरवाही करते हैं। अस्पताल में भर्ती होने पर उनकी सही ढंग से देखरेख हो जाती है।
मुख्य चिकित्साधिकारी डा. यूएस अधिकारी का कहना है कि टीबी रोग में अतिरिक्त सावधानी की जरूरत होती है। इसमें संक्रमण की आशंका ज्यादा रहती है। साथ ही यह भी खतरा रहता है कि कौन मरीज कब आ जाए। ऐसे में अस्पताल में पूरे स्टाफ को तैनात रखना आवश्यक होता है। उन्होंने कहा कि जब टीबी रोग का पूरी तरह उन्मूलन हो जाने की घोषणा होगी तभी स्टाफ को शिफ्ट करने के बारे में सोचा जाएगा।