फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

राज्य आंदोलन के जनक को नहीं मिला आंदोलनकारी का दर्जा 16-07-23

विज्ञापन
विज्ञापन
पिथौरागढ़। राज्य आंदोलन के जनक प्रखर छात्रनेता स्वर्गीय निर्मल पंडित को उनके सपनों के राज्य उत्तराखंड में राज्य आंदोलनकारी का दर्जा नहीं मिल पाया। पंडित वर्ष 1998 में शराब विरोधी आंदोलन के दौरान शहीद हो गए थे।
विज्ञापन


राज्य आंदोलन से जुड़े लोगों को 27 जुलाई 1994 का वह दिन याद है, जब निर्मल पंडित के नेतृत्व में 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण के विरोध में पिथौरागढ़ महाविद्यालय में प्रवेश पत्र फाड़ दिए गए थे। यहीं से पूरे राज्य में ओबीसी विरोधी आंदोलन का आगाज हुआ, जो बाद में राज्य आंदोलन में तब्दील हो गया। राज्य आंदोलन के दौर में पंडित के नेतृत्व में आंदोलनकारियों ने अंतरिम सरकार का गठन किया, जिसके मुख्यमंत्री पंडित चुने गए।

वर्ष 1998 में पहाड़ पर शराब की दुकानों का विरोध चरम पर था। 27 मार्च 1998 को पिथौरागढ़ में शराब की नीलामी का विरोध करने के दौरान पंडित ने कथित रूप से आत्मदाह कर लिया, हालांकि उनके परिजन आज भी नहीं मानते कि निर्मल ने आत्मदाह किया था। दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में इलाज के दौरान 16 मई 1998 को पंडित की मौत हो गई।
विज्ञापन


एक बार फिर पिथौरागढ़ समेत पूरा पहाड़ निर्मल की शहादत को लेकर उबल गया। पंडित के आत्मदाह प्रकरण की सीबीआई जांच की मांग उठी, जो पूरी नहीं हो सकी। पंडित के पिता ईश्वरी प्रसाद जोशी का निधन हो चुका है। मां प्रेमा जोशी पुत्री गीता जोशी के साथ रुद्रपुर में रहती हैं। पंडित माता-पिता के एकलौता पुत्र थे।

58 दिन फतेहगढ़ जेल में बंद रहे थे पंडित
राज्य आंदोलन के दौरान पंडित 58 दिनों तक फतेहगढ़ (फर्रुखाबाद) जेल में बंद रहे। उनके साथ फतेहगढ़ जेल में रहे गोविंद महर (गोपू) को राज्य आंदोलनकारी का दर्जा मिला, लेकिन पंडित को सरकार ने मरणोपरांत राज्य आंदोलनकारी का दर्जा नहीं दिया। उनके साथ जेल में 58 दिन बिताने वाले राज्य आंदोलनकारी गोपू कहते हैं कि पंडित को मरणोपरांत राज्य आंदोलनकारी का दर्जा दिलाने और उनकी मां को पेंशन दिलाने की लड़ाई लगातार लड़ रहे हैं, लेकिन किसी भी सरकार ने इस दिशा में ध्यान नहीं दिया। हर साल पंडित की पुण्यतिथि का आयोजन कर रहे जुगल किशोर पांडे, पंडित ट्रस्ट के सचिव भगवान पंत कहते हैं कि पंडित को राज्य बनने के बाद वह सम्मान नहीं मिला, जिसके वह हकदार थे।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें