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ग्राम स्वराज के लिए तरस रही पंचायतें

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पिथौरागढ़। संवैधानिक अधिकारों के बावजूद ग्राम सभाओं को बुनियादी अधिकार नहीं दिए जा रहे। इससे वंचित ग्राम सभाएं अब भी अपने वजूद को तलाश रही हैं। अधिकारों के अभाव में ग्राम पंचायत खोखला ढांचा भर रह गई हैं। अधिकारों के अभाव में वह कोई फैसला नहीं कर पा रही है। यहां पंचायतें फैसले नहीं लेती, ऊपर से थोपे जाते हैं। ग्राम पंचायतों को बिना बताए गांव की योजनाएं कागजों पर तैयार कर ली जाती हैं।
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कहने को ग्राम पंचायतों को 29 विषयों पर कानून बनाने और लागू करने का अधिकार है, लेकिन हकीकत इससे कोसों दूर है। यहां कानून बनाना तो दूर विकास योजनाओं में पंचायतों के प्रस्ताव तक नहीं लिए जाते हैं। इससे योजनाओं में ग्रामीणों की भागीदारी नहीं जुड़ पाती है। यहां पंचायतें योजनाएं तैयार नहीं करती, बल्कि ऊपर से योजनाएं बनकर आती हैं। इन योजनाओें में ग्राम सभाओं का सीधा सरोकार नहीं रहता। पंचायतों में विकास कार्य नाली और खड़ंजा निर्माण से ऊपर नहीं उठ पाए हैं। इन हालातों में पंचायतों की भूमिका सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन तक रह गई है।

अधिकार देना तो दूर पंचायतों के पर कतरते हुए शिक्षा व स्वास्थ्य समिति से ग्राम प्रधानों को बाहर कर दिया गया है। गांव में शिक्षक या चिकित्सक की तैनाती उनके हाथ में नहीं है। विकास योजनाओं की निगरानी के लिए ग्राम पंचायतों के पास मॉनीटरिंग का अधिकार तक नहीं है। बजट खर्च के मामले में ग्राम सभा स्वतंत्र फैसले नहीं कर सकती है। इन ग्राम पंचायतों की आय को खुद कोई जरिया नहीं है।
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गांवों का विकास राज्य वित्त से मिलने वाली धनराशि और विभिन्न सरकारी योजनाओं पर निर्भर करता है। ऐसे में आज भी पंचायतें ग्राम स्वराज से सपने से कोसों दूर खड़ी हैं। ग्राम प्रधान गिरीश जोशी, देवेंद्र भट्ट आदि का कहना है कि 29 विषयों पर कानून बनाने के अधिकार से ही पंचायतों में सही मायने में स्वराज आ सकता है।
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