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महर बंधुओं के वीरता की कहानी है हिलजात्रा

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पिथौरागढ़। जिला मुख्यालय के कुमौड़ गांव में होनी वाली हिलजात्रा महर बंधुओं की वीरता से जुड़ी है। हिलजात्रा की तैयारी कई दिन पहले शुरू हो जाती है। इसमें भगवान शिव के प्रमुख गण माने जाने वाले लखिया बाबा (वीरभद्र) की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।
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कहा जाता है कि पूर्व में एक बार कुमौड़ के चार महर बंधु नेपाल में होने वाली इंद्रजात्रा को देखने गए थे। तब वहां एक भैंसें की बलि दी जानी थी। भैंसें के सींग विशाल और टेढ़े थे। इस पर नेपाल का कोई भी वीर उसकी बलि नहीं दे पाया। इस पर महर बंधुओं ने नेपाल के राजा से भैंसें की बलि देने की अनुमति मांगी। इसमें वह कामयाब हो गए। इस पर राजा प्रसन्न हुआ और उपहार स्वरूप उसने महर बंधुओं को मुखौटा भेंट किया। महर बंधु मुखौटा लेकर कुमौड़ पहुंचे, तब से हर साल हिलजात्रा का आयोजन किया जाता है। हिलजात्रा से पहले लकड़ी के मुखौटों का रंगरोगन किया जाता है।

हिलजात्रा कमेटी के यशवंत महर इससे जुड़ी एक अन्य कथा भी बताते हैं। हिमालयी राजा दक्ष प्रजापति ने अपने यज्ञ में भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया। इस पर उनकी बेटी सती यज्ञ में पहुंची। दक्ष के भगवान शिव का अपमान करने से वह बहुत आहत हुईं और उन्होंने यज्ञ की अग्नि में कूदकर जान दे दी। इस पर शिव को क्रोध आता है और उस क्रोध की ज्वाला से वीरभद्र का अवतरण होता है। शिव की आज्ञा लेकर वीरभद्र दक्ष के यज्ञ को तहस-नहस कर उनका सिर काट देते हैं। हिलजात्रा में इसी वीरभद्र का रौद्र रूप देखने को मिलता है।
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हिलजात्रा को कृषि उत्सव के रूप में भी मनाया जाता है। सीमांत में होने वाली अन्य जगहों की हिलजात्रा में हिरन-चीत्तल और अन्य पात्र होते हैं, जबकि कुमौड़ में मुख्य पात्र लखिया (वीरभद्र) ही होता है।
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