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लोक कलाकारों की सुध लेने वाला कोई नहीं

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डीडीहाट (पिथौरागढ़)। कभी पर्वतीय क्षेत्र की बारातों में ढोल-दमाऊ की धमक के बीच मंत्रमुग्ध करने वाली मशकबीन की धुन बैंडबाजों में कहीं गुम सी हो गई है। मशकबीन बजाने वाले लोक कलाकार भी बेरोजगारी के दौर से गुजर रहे हैं। यही हाल डीडीहाट के मशकबीन वाद्य कलाकार पुष्कर राम का भी है।
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मिर्थी गांव निवासी पुष्कर राम मशकबीन पर कई कुमांऊनी धुनों को बजाकर सुनने वाले लोगों को मंत्रमुग्ध करते हैं। पुष्कर राम ने बताया कि जब तक बारातों में ढोल दमाऊं का प्रचलन था, उनकी काफी मांग रहती थी। बारात के एक सीजन में उनकी अच्छी आय हो जाती थी, लेकिन जब से बैंड बाजे प्रचलन में आए उन्हें बहुत कम लोग बुलाते हैं। अब गिनी-चुनी बारातों में ही मशकबीन बजाने का अवसर मिलता है। परिवार के भरण-पोषण के लिए अन्य काम भी करने पड़ते हैं।

कैलाश यात्रा रूट बदलने से बंद हुई आय
मशकबीन कलाकार पुष्कर राम को वर्ष 2007 में कैलाश यात्रियों के स्वागत के लिए छोलिया कलाकारों के साथ मशकबीन बजाने के लिए बुलाया गया था। तब से वह हर साल कैलाश यात्रा के समय मशकबीन बजाते थे। इसके एवज में आईटीबीपी के मैस में पुष्कर राम को दो वक्त का खाना मिल जाता था। इस साल कैलाश यात्रा रूट बदलने से यह उनका यह रोजगार भी छिन गया।
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