पिथौरागढ़ । बहुचर्चित पंचेश्वर बांध परियोजना की डीपीआर पर सवाल लगातार उठ रहे हैं। डूब क्षेत्र में आ रही आबादी ने डीपीआर में पर्यावरणीय, भौगोलिक, आर्थिक व सामाजिक सर्वे को झूठ का पुलिंदा करार दिया है। कार्यदायी संस्था पर प्रभावितों के हितों से खिलवाड़ करने का आरोप लगाया है। साथ ही दूसरी एजेंसी से विस्तृत सर्वे कराने की मांग की है।
महाकाली की आवाज संगठन ने डीपीआर के अध्ययन के बाद अपना पक्ष जारी किया है। संगठन के मुताबिक कार्यदायी संस्था वाप्कोस की डीपीआर झूठ का पुलिंदा है। इस रिपोर्ट में दर्शाए गए तथ्य जमीनी हकीकत से कोसों दूर हैं। मसलन नदी उद्गम, पहाड़ों की ऊंचाई को गलत दर्शाया गया है। इसी तरह वनस्पति, जीव-जंतुओं की प्रजातियां वास्तविकता से मेल नहीं खाती हैं। जबकि कई महत्वपूर्ण प्रजातियों का जिक्र तक नहीं है।
संगठन के अनुसार डूब क्षेत्र के परिवार, जनसंख्या का गलत आंकड़ा पेश किया है। झूलाघाट, जौलजीबी अंतरराष्ट्रीय मंडियों का जिक्र नहीं है। इसी तरह भूमिहीन आबादी और व्यवसायियों को भी डीपीआर में जगह नहीं दी है। मंदिर, श्मशान की संख्या और पुनर्वास का मामला स्पष्ट नहीं किया है। सर्वे की जल्दबाजी और तथ्यों से खिलवाड़ का आलम यह है कि जौलजीबी अंतरराष्ट्रीय पुल तक डूब क्षेत्र में नहीं है। जबकि इससे तीन किमी ऊंचाई के गांव डूब क्षेत्र में शामिल हैं।
इस मुद्दे को लेकर संगठन ने डीएम के माध्यम से प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्री और बांध की मंत्री मंडलीय उपसमिति को ज्ञापन भेजकर अपन पक्ष रखा है। इसमें प्रभावित आबादी के मुद्दों की ओर ध्यान आकर्षित किया है। साथ ही डीपीआर के बाद उठे सवालों को सूचीबद्ध कर प्रमाणिकता स्पष्ट करने की मांग की है। संगठन के संयोजक शंकर खड़ायत का कहना कि गलत डीपीआर से प्रभावितों के हितों पर कुठाराघात की कोशिश हुई है। इसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने दूसरी एजेंसी से सर्वे कराने की मांग उठाई है।