मदकोट (पिथौरागढ़)। हर नौजवान के हाथ में अब स्मार्ट फोन जरूर दिख जाता है। दूरदराज के घरों में जहां पर केबिल लाइन नहीं पहुंचती वहां पर लोगों ने डिश एंटीना लगाकर काफी पहले से टेलीविजन के कार्यक्रम देखने शुरू कर दिए हैं। इस बदलाव के बीच यदि कोई व्यक्ति रेडियो पर विविध भारती, आकाशवाणी के राष्ट्रीय और प्रादेशिक समाचार सुनता नजर आए तो ऐसा लगता है जैसे हम पिछले इतिहास की तरफ लौट रहे हैं।
मदकोट बाजार में रहने वाले 80 वर्षीय दुर्गा सिंह बोथियाल आज भी रेडियो के नियमित कार्यक्रमों को सुना करते हैं। सबसे खास बात यह है कि पूरे इलाके में उनको छोड़कर किसी के पास रेडियो नहीं है। यदि नई पीढ़ी को कोई पुराना रेडियो थमा दिया जाए तो शायद उसे चलाना भी न आए।
दुर्गा सिंह बताते हैं कि 1962 में उनकी नौकरी पशुपालन विभाग में लगी थी। तब टीवी कहीं पर नहीं थे। यदि किसी मध्यम वर्गीय आय वाले के पास रेडियो हो तो उसकी प्रतिष्ठा बढ़ जाती थी। वह कहते हैं कि मदकोट में सबसे पहले रेडियो उनके पास ही था। जब 1971 का युद्ध हुआ तो लोग उनके घर पर आकर रेडियो के समाचार सुना करते थे। 1984 में जब इंदिरा गांधी की हत्या हुई, तब भी लोगों ने रेडियो पर ही सबसे पहले यह खबर सुनी।
उसके बाद लोगों की जीवनशैली बदलने लगी। घर घर बिजली का कनेक्शन लग गया। 1990 के बाद तो ऐसी क्रांति आई कि हर घर में टीवी लग गया और लोगों ने रेडियो की तरफ देखना छोड़ दिया। दुर्गा सिंह 1998 में सेवानिवृत्त होकर घर आ गए। उनका एक बेटा शिक्षक और एक आईटीबीपी में नौकरी करता है। उनके घर पर भी बेटों ने टीवी लगा रखे हैं लेकिन दुर्गा सिंह का जैसे रेडियो से प्रेम हो गया है। वह रेडियो में नियमित जयमाला, प्रादेशिक समाचार, राष्ट्रीय समाचार, कृषि चर्चा, विविध भारती के कार्यक्रमों को सुनते हैं। वह बताते हैं कि पहले रेडियो में समाचार वाचक देवकीनंदन पांडे, अशोक बाजपेयी, विनोद कश्यप जैसे लोग थे।
उनके समाचार वाचन का तरीका और प्रस्तुतिकरण इतना बेमिसाल था कि सुनने वाले के सामने सारा चित्र आ जाता था। अब वैसे एंकर नहीं हैं। फिर भी वह कहते हैं कि रेडियो सुनना कभी नहीं छोड़ेंगे। उनके पास फिलिप्स का बहुत पुराना रेडियो है। इसकी वह बेहद हिफाजत करते हैं, क्योंकि यदि रेडियो खराब हो गया तो सुधारने वाला नहीं मिलेगा। वह कहते हैं कि रेडियो पहाड़ के लोगों को सूचना देने का सबसे प्रमुख साधन रहा है, इसके अस्तित्व को बनाए रखा जाए।